असम
पर्यावरण संरक्षण: भारत ने आयोजित की पहली ग्लोबल मर्करी कॉन्फ्रेंस
Tara Tandi
13 Oct 2026 5:40 PM IST

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असम: भारत ने पहली बार 'मर्करी एज़ ए ग्लोबल पॉल्यूटेंट' (ICMGP 2026) पर 17वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी की। इस इवेंट के 36 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब 4 से 9 अक्टूबर के बीच IIT हैदराबाद में 26 देशों के वैज्ञानिक, पॉलिसी बनाने वाले और रिसर्चर एक साथ आए।
छह दिन तक चली इस कॉन्फ्रेंस का विषय "मिनामाता कन्वेंशन के लागू होने के दस साल पूरे होना" था। इसमें मर्करी से होने वाले प्रदूषण, हवा में इसके उत्सर्जन, इकोसिस्टम की सेहत और इंसानों पर इसके असर के साथ-साथ इस बात पर भी चर्चा हुई कि वैज्ञानिक सबूतों को असरदार एनवायरनमेंटल पॉलिसी में कैसे बदला जा सकता है। इसकी अध्यक्षता संयुक्त रूप से IIT हैदराबाद के प्रोफ़ेसर आसिफ़ कुरैशी और UK की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के डॉ. जगन्नाथ बिस्वकर्मा ने की।
इस कॉन्फ्रेंस सीरीज़ में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) की पहली बार आधिकारिक भागीदारी एक अहम बात थी। WHO की केमिकल सेफ़्टी एंड हेल्थ यूनिट की डॉ. एलेना जार्डन ने मर्करी और इंसानी सेहत पर एक प्लेनरी सेशन की अगुवाई की, जिसमें बायो-मॉनिटरिंग, एक्सपोज़र का आकलन और राष्ट्रीय स्तर पर पब्लिक हेल्थ से जुड़े उपायों पर चर्चा हुई। मर्करी पर मिनामाता कन्वेंशन के सेक्रेटेरिएट ने भी इसमें हिस्सा लिया और एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी मोनिका स्टैंकेविच ने इंटरनेशनल मर्करी गवर्नेंस में रिसर्च की भूमिका पर बात की।
सबसे अहम पलों में से एक था जापान के मिनामाता बीमारी के मरीज़ और कहानीकार मसामी ओगाटा का अनुभव। उन्होंने इंडस्ट्रियल मर्करी प्रदूषण के लंबे समय तक इंसानों और समाज पर पड़ने वाले असर के बारे में बताया। उन्होंने मिनामाता बीमारी की ऐतिहासिक त्रासदी (जो जापान के तटीय पानी में इंडस्ट्रियल मर्करी छोड़े जाने से हुई थी) को ऐसी आपदाओं को रोकने की मौजूदा ग्लोबल कोशिशों से जोड़ा।
साइंटिफिक सेशन में एटमॉस्फेरिक मर्करी, टॉक्सिकोलॉजी, एक्वेटिक इकोसिस्टम और प्रदूषण की निगरानी करने वाले एक्सपर्ट्स एक साथ आए। दक्षिण अफ़्रीका, चीन, रूस, ब्राज़ील और अर्जेंटीना के रिसर्चर ने लंबे समय तक निगरानी और उत्सर्जन डेटा में कमियों पर चर्चा की, खासकर डेवलपिंग इकॉनमीज़ के संदर्भ में।
इस कॉन्फ्रेंस ने नॉर्थ-ईस्ट इंडिया को मर्करी पर ग्लोबल बहस में एक अहम जगह भी दिलाई। असम की नागांव यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने खेती की मिट्टी और फ़सलों में मर्करी प्रदूषण पर अपना काम पेश किया, जबकि यूनिवर्सिटी की डॉ. फ़रिश्ता यास्मीन इवेंट की साइंटिफिक स्टीयरिंग कमिटी का हिस्सा थीं। इस इलाके में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का इतिहास पुराना है: असम के माकुम कोलफील्ड में कोयले की खुदाई 19वीं सदी के आखिर से हो रही है, और ज़्यादा सल्फर वाले कोयले की खुदाई से निकलने वाले कचरे से मिट्टी, पानी और हवा में मरकरी (पारा) जैसी भारी धातुएँ मिल सकती हैं। ब्रह्मपुत्र बेसिन में बसे और खेती पर निर्भर राज्य के लिए, ऐसी रिसर्च का सीधा असर खाद्य सुरक्षा, पानी की गुणवत्ता और लोगों की सेहत पर पड़ता है। समापन सत्र के दौरान, अरुणाचल प्रदेश के गुमजुम हैदर ने पूर्वी हिमालय में समुदाय के नेतृत्व में जैव-विविधता संरक्षण पर ज़ोर दिया। उन्होंने सिंगचुंग बुगुन विलेज कम्युनिटी रिज़र्व, खतरे में पड़ी बुगुन लियोसिचला प्रजाति को बचाने की कोशिशों और पक्के टाइगर रिज़र्व के पास हॉर्नबिल के संरक्षण के बारे में बात की।
1990 में स्वीडन में शुरू हुए इस कार्यक्रम को तेलंगाना सरकार और भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का समर्थन मिला। इसका समापन 11 स्टूडेंट रिसर्चर्स को पोस्टर अवॉर्ड देने के साथ हुआ, जिसमें इस क्षेत्र में काम कर रहे युवा वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया।
आयोजकों ने कहा कि हैदराबाद में हुई चर्चाओं और बनी साझेदारियों से मरकरी प्रदूषण से निपटने और वैज्ञानिक रिसर्च व नीतिगत कार्रवाई के बीच संबंध को मज़बूत करने की जारी अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को मदद मिलने की उम्मीद है।
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