
x
असम में GPS से खुला हाथियों की आवाजाही का राज
गुवाहाटी: असम में जंगली हाथियों की आवाजाही और उनके प्राकृतिक आवासों को समझने के लिए किए गए पांच वर्षीय अध्ययन में महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। असम वन विभाग और विश्व वन्यजीव कोष-भारत (WWF-India) द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन में GPS तकनीक की मदद से हाथियों के आने-जाने के रास्तों, उनके रहने के स्थानों और मौसमी गतिविधियों का पता लगाया गया है। अध्ययन में 38 हजार से अधिक GPS लोकेशन दर्ज की गई हैं।
इस अध्ययन की रिपोर्ट 6 अक्टूबर 2026 को गुवाहाटी में आयोजित 72वें वन्यजीव सप्ताह कार्यक्रम के दौरान जारी की गई। असम के पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंत मल्लबरुआ ने रिपोर्ट का विमोचन किया। इसका शीर्षक 'ट्रैकिंग द जायंट्स: मूवमेंट एंड हैबिटेट-यूज पैटर्न्स ऑफ GPS-कॉलर्ड एलीफेंट्स इन असम' रखा गया है। रिपोर्ट का उद्देश्य हाथियों के संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की दिशा में वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना है।
अध्ययन के तहत वर्ष 2021 से 2026 के बीच असम के उदलगुड़ी, सोनितपुर और बिश्वनाथ जिलों में हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखी गई। शोधकर्ताओं ने चार मादा नेतृत्व वाले हाथी समूहों और एक अकेले नर हाथी पर GPS कॉलर लगाए। इन उपकरणों की मदद से उनके स्थान और आवाजाही से संबंधित जानकारियां एकत्र की गईं। शोध में सामने आया कि हाथियों की गतिविधियां केवल घने जंगलों तक सीमित नहीं हैं। वे भोजन, पानी और सुरक्षित रास्तों की तलाश में चाय बागानों, कृषि क्षेत्रों, नदी किनारे के इलाकों तथा मानव बस्तियों के आसपास भी पहुंचते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सोनाई रूपाई वन्यजीव अभयारण्य, बेहाली वन्यजीव अभयारण्य और बोरनाडी वन्यजीव अभयारण्य हाथियों के महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास हैं। अध्ययन में पाया गया कि हाथी वर्ष के अधिकांश समय संरक्षित वन क्षेत्रों और आरक्षित जंगलों का उपयोग करते हैं। हालांकि मौसम और कृषि गतिविधियों के अनुसार उनके आवागमन के क्षेत्र बदलते रहते हैं। विशेष रूप से धान की खेती के मौसम में मादा नेतृत्व वाले हाथी समूहों की आवाजाही का दायरा बढ़ जाता है। इसी दौरान मानव और हाथियों के बीच संघर्ष की घटनाओं का खतरा भी अधिक रहता है।
शोधकर्ताओं को यह भी पता चला कि असम के चाय बागान हाथियों के लिए महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग और वैकल्पिक आवास का काम करते हैं। हाथी इन क्षेत्रों से गुजरते हुए कई बार आबादी वाले स्थानों के करीब पहुंच जाते हैं। इससे स्थानीय लोगों और वन्यजीवों दोनों की सुरक्षा को लेकर चुनौतियां पैदा होती हैं।
अध्ययन में हाथियों के नदी मार्गों का उपयोग करने की भी जानकारी मिली है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हाथी हिमालय की तलहटी के जंगलों और ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित घास के मैदानों के बीच आवाजाही के लिए नदी की धाराओं और संबंधित मार्गों का उपयोग करते हैं। इसके अलावा असम के उदलगुड़ी जिले और भूटान के जोमोत्सांगखा वन्यजीव अभयारण्य के बीच हाथियों की सीमा पार आवाजाही भी दर्ज की गई। इससे स्पष्ट हुआ कि हाथियों के संरक्षण के लिए भारत और भूटान के बीच समन्वय महत्वपूर्ण है।
अध्ययन में कुछ ऐसे रास्तों की भी पहचान हुई है, जहां हाथियों की आवाजाही सड़क, रेलवे लाइन और मानव बस्तियों से होकर गुजरती है। इन स्थानों पर दुर्घटनाओं और संघर्ष की आशंका रहती है। वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करके आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं। असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक विनय गुप्ता ने अध्ययन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे राज्य में हाथियों की उपस्थिति और उनके आवागमन के बारे में जानकारी की कमी दूर करने में मदद मिलेगी।
Next Story





