असम
Assam: जमानत के लिए मांगी घूस, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का सदस्य गिरफ्तार
Tara Tandi
18 Sept 2026 10:47 AM IST

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गुवाहाटी: असम के उदलगुरी ज़िले में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (FT) के एक सदस्य को ज़मानत पर एक व्यक्ति को रिहा करने के लिए 15,000 रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने यह जानकारी दी।
उदलगुरी के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SSP) पद्मनाभ बरुआ ने बताया कि 2018 से ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे भूपेन चंद्र पेगु को 29 अगस्त को मिली एक शिकायत की जांच के बाद गिरफ़्तार किया गया।
पुलिस ने बताया कि पेगु पर एक ऐसे व्यक्ति से 15,000 रुपये मांगने का आरोप था जिसका मामला ट्रिब्यूनल में लंबित था। शिकायतकर्ता और वह व्यक्ति, जिसका मामला लंबित था, उनकी पहचान उजागर नहीं की गई है।
पेगु के ख़िलाफ़ मज़बत पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(2) (जबरन वसूली) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(a) (सार्वजनिक कर्तव्य का अनुचित या बेईमानी से पालन करने के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करना या प्राप्त करने का प्रयास करना) के तहत FIR दर्ज की गई।
पुलिस के बयान में कहा गया है कि एक मुखबिर से जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई शुरू की गई। पुलिस ने बताया कि इसके बाद पेगु को स्थानीय जज के सामने पेश किया गया।
फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल असम में एक अर्ध-न्यायिक निकाय है जो यह तय करता है कि कोई व्यक्ति अवैध अप्रवासी है या विदेशी। यह संदिग्ध विदेशियों को निर्धारित डिटेंशन कैंपों में हिरासत में रखने का आदेश भी दे सकता है। असम में लगभग 100 सक्रिय ट्रिब्यूनल हैं।
ट्रिब्यूनल के कामकाज को लेकर चिंताएं
इस मामले ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के कामकाज को प्रभावित करने के प्रयासों के आरोपों को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं।
करीमगंज (अब श्रीभूमि) में ट्रिब्यूनल के पूर्व सदस्य शिशिर डे ने इस घटनाक्रम को चिंताजनक प्रवृत्ति बताया। उन्होंने 2018-19 में ट्रिब्यूनल की कार्यवाही को प्रभावित करने के प्रयासों के आरोपों को याद करते हुए कहा कि उस समय एक ट्रिब्यूनल सदस्य को निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं।
डे ने कहा कि इस ताज़ा मामले ने सिस्टम के कामकाज को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं और तर्क दिया कि अगर आरोप साबित होते हैं, तो पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही नागरिकता से संबंधित होती है और विदेशी घोषित किए गए व्यक्ति को वापस भेजे जाने (पुश-बैक) के प्रावधानों का सामना करना पड़ सकता है। सोशल एक्टिविस्ट कमल चक्रवर्ती ने ट्रिब्यूनल के फैसलों के नतीजों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि भले ही ये संस्थाएं अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) हों, लेकिन नागरिकता पर उनकी राय के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
चक्रवर्ती ने कहा कि ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें ट्रिब्यूनल ने असली भारतीयों को विदेशी घोषित कर दिया।
ट्रिब्यूनल के पूर्व सदस्य और वकील धर्मानंद देब ने कहा कि अगर पेगु ने न्यायिक प्रक्रिया में हेरफेर करने की कोशिश की है, तो उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए।
सीनियर वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी ने भी ट्रिब्यूनल के सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सदस्यों का चयन राज्य सरकार करती है और उनमें से कई प्रैक्टिस करने वाले वकील होते हैं।
चौधरी ने सुझाव दिया कि युवा वकीलों के बजाय ट्रिब्यूनल में रिटायर जजों को नियुक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कानूनी जानकारी और समझ की कमी के कारण गुवाहाटी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के कई आदेशों को रद्द कर दिया है।
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