असम
असम: कटी बिहू पर किसानों ने खेत-खलिहानों में जलाए मिट्टी के दीये
Tara Tandi
18 Oct 2026 7:08 PM IST

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Assam: असम में 'काटी बिहू' मनाया जा रहा है। यह राज्य के पारंपरिक कृषि त्योहारों में से एक है। ग्रामीण इलाकों में परिवार इस अवसर से जुड़ी रस्में निभा रहे हैं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को सहेज कर रखे हुए हैं।
बच्चे हों या बुजुर्ग, हर उम्र के लोग इन रस्मों में हिस्सा ले रहे हैं। इन पारंपरिक रीति-रिवाजों का मुख्य उद्देश्य घर-परिवार की भलाई, समृद्धि और खेतों में खड़ी फसलों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना है।
इस त्योहार का एक मुख्य आयोजन कालियाबोर के बोरभकाटी-सोनारी खेतों में किया जा रहा है। इसका आयोजन 'असम गण परिषद' (AGP) के किसान विंग, 'असम कृषक परिषद' की कालियाबोर विधानसभा क्षेत्र इकाई द्वारा किया गया है। असम के मंत्री केशव महंत भी इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं।
काटी बिहू की एक प्रमुख रस्म पवित्र तुलसी के पौधे के नीचे मिट्टी के दीये जलाना है। शाम के समय, लोग अपने आंगन में तुलसी के पास दीये जलाते हैं और अपने परिवार की खुशी, भलाई और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
एक और महत्वपूर्ण परंपरा खेतों में ऊंचे बांस के खंभों पर 'आकाश बंती' (आकाश दीप) जलाने की है। यह प्रथा स्थानीय मान्यताओं से जुड़ी है और इसे पूर्वजों की आत्माओं को सम्मान देने का एक तरीका माना जाता है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, ये आकाश दीप फसलों को नुकसान और विपत्तियों से बचाने के लिए की गई प्रार्थनाओं का भी प्रतीक हैं।
काटी बिहू, जिसे 'कोंगाली बिहू' के नाम से भी जाना जाता है, असमिया महीने 'काटी' में मनाया जाता है। इस समय खेतों में धान की फसलें बढ़ रही होती हैं और किसान फसल कटाई का इंतजार कर रहे होते हैं। 'बोहाग बिहू' (जो काफी धूमधाम से मनाया जाता है) और फसल कटाई से जुड़े 'माघ बिहू' के विपरीत, काटी बिहू को पारंपरिक रूप से सादगी के साथ मनाया जाता है, जो कृषि मौसम की अनिश्चितताओं को दर्शाता है।
यह त्योहार असम की कृषि परंपराओं को जीवित रखता है। लोग आज भी उन रस्मों का पालन करते हैं, जो खेती-बाड़ी के जीवन, पूर्वजों से जुड़ी मान्यताओं और घर-परिवार की पूजा-अर्चना को आपस में जोड़ती हैं।
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