
x
नागरिक समाज
Assam : असम में सिविल सोसाइटी की लंबी चुप्पी का टूटना: 177 नागरिकों का सार्वजनिक वक्तव्य और लोकतांत्रिक चिंता
असम में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित है या नागरिक विवेक, असहमति और नैतिक साहस भी उसका अनिवार्य हिस्सा हैं। वर्षों से जिस सिविल सोसाइटी को या तो खामोश माना जा रहा था, या हाशिये पर धकेल दिया गया था, उसी असम में 177 स्कॉलर्स, वकीलों, एक्टिविस्ट्स, जर्नलिस्ट्स और स्टूडेंट्स द्वारा जारी किया गया सार्वजनिक वक्तव्य एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। इस बयान में उन्होंने मौजूदा घटनाओं और नीतिगत रुझानों को “पक्षपातपूर्ण और चिंताजनक” करार दिया है—और यह भाषा अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
चुप्पी का इतिहास और उसका संदर्भ
असम की सिविल सोसाइटी की चुप्पी अचानक नहीं आई। यह चुप्पी वर्षों के दबाव, ध्रुवीकरण, कानूनी भय और सामाजिक विभाजन का परिणाम रही है। एनआरसी, सीएए, डिटेंशन सेंटर्स, मीडिया पर बढ़ता दबाव, और असहमति को राष्ट्र-विरोध के रूप में चिन्हित करने की प्रवृत्ति—इन सबने मिलकर एक ऐसा माहौल बनाया जिसमें बोलना जोखिम भरा हो गया।
कई बुद्धिजीवी, शिक्षक और पत्रकारों ने निजी बातचीत में चिंता जताई, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर आवाज़ कम ही उठी। इसका कारण केवल डर नहीं था, बल्कि यह भी था कि असम का समाज जातीय, भाषाई और धार्मिक स्तर पर पहले से ही अत्यंत संवेदनशील है। किसी भी हस्तक्षेप को “एक पक्ष” में खड़ा होने के रूप में देखा जाने लगा।
177 हस्ताक्षर: संख्या से अधिक उसका अर्थ
177 कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं लग सकती, लेकिन असम के वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में यह एक साहसिक सामूहिक कदम है। इन हस्ताक्षरकर्ताओं में विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, हाई कोर्ट और जिला स्तर के वकील, ग्राउंड पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और छात्र शामिल हैं। यह विविधता इस बयान को केवल एक “इलीट प्रतिक्रिया” होने से बचाती है।
इस वक्तव्य की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह किसी एक समुदाय या समूह के लिए नहीं, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के लिए चिंता व्यक्त करता है।
“पक्षपातपूर्ण और चिंताजनक”: शब्दों का वजन
बयान में इस्तेमाल किए गए शब्द—biased और disturbing—राजनीतिक भाषा में हल्के नहीं माने जाते। “पक्षपातपूर्ण” का अर्थ है कि राज्य या संस्थाएँ तटस्थ नहीं रहीं। और “चिंताजनक” यह दर्शाता है कि बात केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं।
हस्ताक्षरकर्ता विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हैं कि:
कानून का चयनात्मक उपयोग हो रहा है
असहमति को अपराध की तरह देखा जा रहा है
मीडिया का एक हिस्सा सत्ता के सवाल पूछने के बजाय उसका विस्तार बन गया है
छात्रों और युवाओं में भय का माहौल है
नागरिक समाज की भूमिका पर पुनर्विचार
यह वक्तव्य असम में नागरिक समाज की भूमिका पर एक नए सिरे से सोचने को मजबूर करता है। क्या सिविल सोसाइटी का काम केवल सेमिनार और बंद कमरों में चर्चा तक सीमित है? या जब संवैधानिक मूल्यों पर चोट हो, तब सार्वजनिक रूप से बोलना भी उसकी ज़िम्मेदारी है?
इतिहास गवाह है कि जब-जब सिविल सोसाइटी ने अपनी भूमिका छोड़ी है, तब-तब सत्ता निरंकुश हुई है। असम जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील राज्य में यह खतरा और भी गंभीर हो जाता है।
छात्रों और युवाओं की भागीदारी
इस बयान में छात्रों की मौजूदगी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आज का छात्र केवल करियर और परीक्षा तक सीमित नहीं है—वह सवाल कर रहा है, पढ़ रहा है, और इतिहास को वर्तमान से जोड़ रहा है। यह भागीदारी यह भी दिखाती है कि डर के बावजूद एक नई पीढ़ी चुप रहने को तैयार नहीं है।
हालाँकि, बयान यह भी इंगित करता है कि विश्वविद्यालय परिसरों में बहस की जगह सिमट रही है, और प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
मीडिया और बौद्धिक जिम्मेदारी
असम का मीडिया परिदृश्य भी इस बयान के केंद्र में है। हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि कई मुख्यधारा मीडिया संस्थान सत्ता से असहज सवाल पूछने में विफल रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप अफवाह, नफरत और एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा मिला है।
यह बयान पत्रकारिता को उसकी मूल भूमिका—सत्ता से सवाल पूछना—याद दिलाने का प्रयास भी है।
आगे का रास्ता: संवाद या दमन?
सबसे अहम सवाल यह है कि राज्य और समाज इस बयान को कैसे लेते हैं। क्या इसे देशद्रोह, शरारत या “अर्बन नक्सल” जैसी संज्ञाओं में बांधा जाएगा? या इसे एक लोकतांत्रिक चेतावनी के रूप में देखा जाएगा?
यदि सत्ता संवाद का रास्ता चुनती है, तो यह असम के लिए एक सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन यदि प्रतिक्रिया दमनात्मक होती है, तो यह बयान भविष्य में और बड़े प्रतिरोध की भूमिका बन सकता है।
निष्कर्ष: चुप्पी का टूटना ही शुरुआत है
177 नागरिकों का यह सार्वजनिक वक्तव्य कोई अंतिम शब्द नहीं है—यह सिर्फ़ शुरुआत है। असम में सिविल सोसाइटी की लंबी चुप्पी का टूटना यह दिखाता है कि डर के बावजूद विवेक अब भी जीवित है।
Tagsअसमनागरिक समाजबंगाली मुसलमानमुख्यमंत्री के ‘घृणास्पद बयान’Assamcivil societyBengali MuslimsChief Minister's 'hate speech'जनता से रिश्ता न्यूज़जनता से रिश्ताजनता से रिश्ता.कॉमआज की ताजा न्यूज़हिंन्दी न्यूज़भारत न्यूज़खबरों का सिलसिलाआज की ब्रेंकिग न्यूज़आज की बड़ी खबरमिड डे अख़बारJanta Se Rishta NewsJanta Se RishtaToday's Latest NewsHindi NewsIndia NewsKhabron Ka SilsilaToday's Breaking NewsToday's Big NewsMid Day Newspaper
Next Story





