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अरुणाचल प्रदेश
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम स्थानीय अधिकार, सियांग घाटी में गहराता टकराव
nidhi
7 Oct 2026 2:52 PM IST

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सीमा की रणनीति के बीच आदिवासी जमीन
विशेष लेख: सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ नक्शे पर खींची गई रेखाओं का सवाल नहीं होती। वह उनकी जमीन, जंगल, नदी, घर, आजीविका और पहचान से सीधे जुड़ी होती है। अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित Siang Upper Multipurpose Project यानी SUMP को लेकर जारी विरोध इसी जटिल सवाल को सामने ला रहा है—क्या राष्ट्रीय रणनीतिक जरूरतों के नाम पर स्थानीय समुदायों की सहमति और चिंताओं को पीछे रखा जा सकता है?
प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की क्षमता करीब 11,000 से 12,500 मेगावाट बताई जा रही है। सरकार इसे सिर्फ बिजली उत्पादन की परियोजना नहीं, बल्कि चीन की ओर यारलुंग त्सांगपो पर बनाए जा रहे विशाल मेडोग बांध के संभावित प्रभावों का जवाब भी बताती है। भारतीय पक्ष का तर्क है कि बड़ा जलाशय भविष्य में अचानक जलप्रवाह बढ़ने या घटने की स्थिति से निपटने में मदद कर सकता है और सीमावर्ती क्षेत्र में रणनीतिक सुरक्षा मजबूत कर सकता है। लेकिन जिस नदी को रणनीतिक दृष्टि से जल संसाधन और सुरक्षा कवच माना जा रहा है, वही स्थानीय आदि समुदायों के लिए जीवन और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है। सियांग उनके लिए सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है। स्थानीय लोककथाओं, परंपराओं, धार्मिक विश्वासों और रोजमर्रा के जीवन में इस नदी का गहरा स्थान है। स्थानीय विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि परियोजना से उनकी पैतृक जमीन, गांव और सांस्कृतिक निरंतरता प्रभावित हो सकती है।
विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा फिलहाल बांध निर्माण से पहले प्रस्तावित प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट यानी PFR सर्वे है। सरकार का कहना है कि यह केवल प्रारंभिक अध्ययन है और अंतिम फैसला बाद में होगा। दूसरी ओर स्थानीय समुदायों का सवाल है कि अगर वे शुरुआत से ही परियोजना के विरोध में हैं, तो भारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी में सर्वे कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
सितंबर के आखिर और अक्टूबर की शुरुआत में तनाव तेजी से बढ़ा। विरोध प्रदर्शन के दौरान सड़कें जाम हुईं, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं और स्थानीय विधायक के आवास में तोड़फोड़ की भी खबर सामने आई। कुछ वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। बाद के दिनों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप लगे। Siang Indigenous Farmers' Forum ने दावा किया कि झड़पों में परियोजना प्रभावित परिवारों के 67 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा संगठन का दावा है।
यहीं से विवाद सिर्फ बांध तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि सरकार और सीमावर्ती समुदायों के बीच संवाद किस स्तर पर हुआ। सरकार बार-बार कह रही है कि परियोजना जबरन लागू नहीं की जाएगी और वह बातचीत के लिए तैयार है। इसके बावजूद अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती ने स्थानीय लोगों के बीच अविश्वास बढ़ाया है।
सीमा की राजनीति में अक्सर एक विरोधाभास पैदा होता है। जिस समुदाय को रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण बताया जाता है, वही समुदाय विकास परियोजनाओं की सबसे बड़ी सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत भी चुका सकता है। सड़क, बांध, सैन्य ढांचा और ऊर्जा परियोजनाएं राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन उनके सीधे प्रभाव सबसे पहले स्थानीय लोगों पर पड़ते हैं।
सियांग मामले में यही टकराव साफ दिखाई देता है। एक तरफ चीन का विशाल मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है, जिसे भारत गंभीर रणनीतिक चुनौती के रूप में देखता है। दूसरी तरफ भारत की जवाबी परियोजना से संभावित विस्थापन, पारिस्थितिक बदलाव और जमीन डूबने की आशंका है। स्थानीय लोगों के लिए यह भू-राजनीति से पहले अपने घर और भविष्य का सवाल है।
हिमालयी क्षेत्र में इतने बड़े बांधों को लेकर भूकंपीय जोखिम भी बहस का हिस्सा है। विरोध करने वाले समूहों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि परियोजना की पारिस्थितिक और सामाजिक कीमत का विस्तृत अध्ययन होना चाहिए। सरकार की ओर से दावा किया गया है कि पर्यावरणीय मानकों और सुरक्षा उपायों का पालन किया जाएगा।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम शब्द है—सहमति। किसी भी बड़ी परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता केवल इंजीनियरिंग रिपोर्ट से नहीं मिलती। जिन लोगों की जमीन, गांव और जीवन सीधे प्रभावित होंगे, उन्हें शुरुआत से निर्णय प्रक्रिया में भरोसेमंद हिस्सेदार बनाना जरूरी है।
अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस ने भी हालिया तनाव के बाद सरकार से बल प्रयोग की जगह बातचीत को प्राथमिकता देने की मांग की है। इससे साफ है कि सियांग परियोजना अब तकनीकी और पर्यावरणीय विषय से आगे राजनीतिक मुद्दा भी बन चुकी है।
सीमावर्ती समुदायों को देश की पहली सुरक्षा पंक्ति कहा जाता है। यदि यही समुदाय अपने राज्य और सरकार से असुरक्षित महसूस करने लगे तो यह राष्ट्रीय हित के लिहाज से भी चिंताजनक स्थिति होगी। रणनीतिक परियोजनाओं की मजबूती सिर्फ कंक्रीट और मेगावाट से तय नहीं होती, बल्कि स्थानीय विश्वास से भी होती है।
सियांग की बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक नदी या एक बांध से बड़ा प्रश्न उठाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतें और चीन से जुड़ी रणनीतिक चिंताएं वास्तविक हैं, लेकिन स्थानीय अधिकार, पर्यावरण और सांस्कृतिक अस्तित्व भी उतने ही वास्तविक हैं।
समाधान किसी एक पक्ष को पराजित करने में नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया बनाने में है जिसमें वैज्ञानिक अध्ययन, पारदर्शिता, स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन और स्थानीय समुदायों की वास्तविक भागीदारी हो।
सियांग घाटी में आज जो संघर्ष दिखाई दे रहा है, वह यह चेतावनी भी है कि सीमा पर राजनीति की कीमत केवल सरकारें नहीं चुकातीं। सबसे भारी कीमत अक्सर वही लोग चुकाते हैं, जिनके गांव नक्शे पर देश की आखिरी सीमा के सबसे करीब होते हैं।
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