अरुणाचल प्रदेश

Guwahati: 160 साल से लुप्त हिमालयी पौधा दिबांग घाटी में फिर से खोजा गया

nidhi
20 Jan 2026 6:21 AM IST
Guwahati: 160 साल से लुप्त हिमालयी पौधा दिबांग घाटी में फिर से खोजा गया
x
हिमालयी पौधा दिबांग घाटी
Guwahati: ब्रिटिश काल में बॉटैनिकल खोज के दौरान आखिरी बार देखी गई एक दुर्लभ पौधे की प्रजाति अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों में फिर से सामने आई है। साइंटिफिक रिकॉर्ड से करीब 160 साल तक गायब रहने के बाद इस पौधे की पुनः खोज को वैज्ञानिक जगत में एक बड़ी उपलब्धि और ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है।
यह खोज अरुणाचल प्रदेश के दूरस्थ और कम अध्ययन किए गए वन क्षेत्रों में एक हालिया फील्ड सर्वे के दौरान हुई। वनस्पति विज्ञानियों की एक टीम जब नियमित जैव-विविधता आकलन अभियान पर थी, तब उन्हें यह पौधा दिखाई दिया। शुरुआती जांच में इसके पत्तों की संरचना, फूलों का आकार और वृद्धि पैटर्न 19वीं सदी के ब्रिटिश कालीन हर्बेरियम रिकॉर्ड से मेल खाते पाए गए।
### 160 साल पुराना इतिहास
इस पौधे को आखिरी बार 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश बॉटनिस्टों द्वारा दर्ज किया गया था, जब वे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में वनस्पति अध्ययन कर रहे थे। उस समय सीमित संसाधनों और दुर्गम इलाकों के कारण कई प्रजातियों को केवल एक या दो बार ही देखा जा सका। बाद के वर्षों में व्यापक खोज के बावजूद यह पौधा फिर कभी नहीं मिला, जिससे इसे या तो विलुप्त या अत्यंत दुर्लभ मान लिया गया।
वैज्ञानिक साहित्य में यह प्रजाति “लॉस्ट स्पीशीज़” की श्रेणी में आ चुकी थी। कई पीढ़ियों के वनस्पति वैज्ञानिकों ने इसे केवल किताबों और सूखे नमूनों में ही देखा था।
### अरुणाचल के जंगलों में वापसी
अरुणाचल प्रदेश, जो भारत के सबसे जैव-विविध राज्यों में से एक है, अब भी कई रहस्यमयी प्रजातियों का घर माना जाता है। ऊँचे पहाड़, घने वर्षावन और सीमित मानवीय हस्तक्षेप इस क्षेत्र को जैव-विविधता के लिए अनुकूल बनाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पौधा एक ऐसे माइक्रो-हैबिटैट में पाया गया जहाँ नमी, ऊँचाई और मिट्टी की संरचना बिल्कुल अनुकूल थी। संभव है कि यही कारण हो कि यह प्रजाति इतने वर्षों तक मानव की नजरों से बची रही।
### वैज्ञानिक पुष्टि की प्रक्रिया
खोज के बाद पौधे के नमूनों को सावधानीपूर्वक एकत्र किया गया और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों में अध्ययन के लिए भेजा गया। डीएनए विश्लेषण, मॉर्फोलॉजिकल तुलना और ऐतिहासिक दस्तावेजों से मिलान के बाद वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान की पुष्टि की।
एक वरिष्ठ वनस्पति वैज्ञानिक के अनुसार,
“यह केवल एक पौधे की खोज नहीं है, बल्कि यह साबित करता है कि प्रकृति में अब भी कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनके बारे में हमें बहुत कम जानकारी है।”
### संरक्षण की चुनौती
हालाँकि यह खोज उत्साहजनक है, लेकिन इसके साथ ही संरक्षण की बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। जिस क्षेत्र में यह पौधा मिला है, वह जलवायु परिवर्तन, सड़क निर्माण और मानवीय गतिविधियों के दबाव में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते संरक्षण उपाय नहीं किए गए, तो यह प्रजाति दोबारा खतरे में पड़ सकती है। राज्य के वन विभाग और शोध संस्थानों द्वारा इस क्षेत्र को “संरक्षण प्राथमिकता क्षेत्र” घोषित करने पर विचार किया जा रहा है।
### पूर्वोत्तर भारत और जैव-विविधता
यह खोज एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि पूर्वोत्तर भारत वैश्विक जैव-विविधता के नक्शे पर कितना महत्वपूर्ण है। यहाँ अब भी कई पौधे और जीव प्रजातियाँ ऐसी हो सकती हैं, जो विज्ञान की दुनिया के लिए अज्ञात हैं या जिन्हें विलुप्त मान लिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक शोध से जोड़कर ऐसी खोजों को और बढ़ावा दिया जा सकता है।
### वैज्ञानिक जगत में उत्साह
इस पुनः खोज ने न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय का भी ध्यान खींचा है। कई वैश्विक जर्नल्स में इस पर रिसर्च पेपर प्रकाशित करने की तैयारी चल रही है। इससे भारत की वनस्पति अनुसंधान क्षमता को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद है।
### एक उम्मीद की किरण
160 साल बाद किसी पौधे की वापसी यह संदेश देती है कि संरक्षण और शोध के संयुक्त प्रयासों से खोई हुई विरासत को फिर से पाया जा सकता है। यह खोज आने वाली पीढ़ियों के वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा है और यह याद दिलाती है कि प्रकृति को समझने की हमारी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है।
Next Story