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कांग्रेस ने कहा कि CBI जांच के बीच अरुणाचल के CM पेमा खांडू का फाइलों पर 'कंट्रोल' है

Arunachal Pradesh अरुणाचल प्रदेश: कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में “खुलकर दिखाने” की रणनीति अपनाई है, जिसमें मुख्यमंत्री पेमा खांडू को उन सभी फाइलों पर नियंत्रण दिया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत CBI जांच के दायरे में आती हैं।
कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और कम्युनिकेशन मामलों के प्रभारी जयराम रमेश ने इस मामले में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के इस कदम ने सभी नियम और सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया है। उन्होंने कहा, “यह सुप्रीम कोर्ट का अपमान है। भाजपा ने एक संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक आदेश की अवमानना करके राज्य में CBI जांच को अपने राजनीतिक एजेंडा के अनुसार नियंत्रित करने की कोशिश की है।”
रमेश ने आगे कहा कि राज्य की कानून-व्यवस्था और जांच प्रक्रिया पर यह हस्तक्षेप गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने दावा किया कि BJP का यह कदम केंद्रीय जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कांग्रेस के अनुसार, इस फैसले से न केवल न्यायपालिका की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी, बल्कि आम जनता में भी सरकार की निष्पक्षता पर विश्वास कम होगा।
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि राज्य में चल रही CBI जांच को राजनीतिक एजेंडे से अलग रखना चाहिए, ताकि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव डाला गया, तो इससे न केवल जांच के परिणाम प्रभावित होंगे, बल्कि भविष्य में किसी भी संवेदनशील मामले की स्वतंत्र जांच पर भी सवाल उठेंगे।
इस बीच भाजपा ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को फाइलों का नियंत्रण देना राज्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका CBI जांच की निष्पक्षता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पार्टी ने दावा किया कि जांच पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही की जा रही है और किसी भी तरह की राजनीतिक हेरफेर की संभावना नहीं है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में अरुणाचल प्रदेश की राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी असर डाल सकता है। भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मसले को लेकर जुबानी जंग जारी है, और विपक्ष इसे केंद्र सरकार और राज्य नेतृत्व की संवैधानिक मर्यादा पर हमला बताकर प्रचारित कर रहा है।
इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर भी चर्चा तेज हो गई है। आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह मामला यह सवाल खड़ा करता है कि क्या राजनीतिक सत्ता जांच एजेंसियों के कामकाज को प्रभावित कर सकती है और इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर क्या असर पड़ेगा।





