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Andhra: सुप्रीम कोर्ट ने 34% BC कोटे पर आंध्र प्रदेश की याचिका खारिज की

अमरावती: स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों (BCs) के लिए 34 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने की आंध्र प्रदेश सरकार की कोशिश को शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा। कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज कर दी और कोटा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए गए 'यूनिफाइड फैमिली सर्वे' डेटा के कानूनी आधार पर सवाल उठाए।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने राज्य सरकार की 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) को खारिज कर दिया। इस याचिका में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के 1 अक्टूबर के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें सरकार के उन दो आदेशों को रद्द कर दिया गया था जिनके ज़रिए BC आरक्षण को मौजूदा 24 प्रतिशत से बढ़ाने की कोशिश की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला तर्कपूर्ण और "काफी उचित" था। कोर्ट ने खासकर इस बात पर सवाल उठाया कि क्या सरकार का डेटा कानूनी रूप से वैध था और क्या वह कुल 50 प्रतिशत की सीमा से ज़्यादा आरक्षण को सही ठहराने के लिए पर्याप्त था।
सुनवाई मुख्य रूप से सरकार के फैसले के लिए सबूतों के आधार पर केंद्रित रही। आंध्र प्रदेश की ओर से पेश हुए सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने सवाल किया कि हाई कोर्ट ने राज्य के डेटा को अविश्वसनीय क्यों माना। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने आयोग की रिपोर्ट पेश करने के लिए समय भी मांगा।
उन्होंने 57 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े राजस्थान के एक मामले का भी हवाला दिया। हालांकि, जस्टिस दत्ता ने बार-बार राज्य से BC आरक्षण तय करने के लिए 'यूनिफाइड फैमिली सर्वे' के इस्तेमाल का कानूनी आधार बताने को कहा। जज ने पूछा, "पहले हमें यह बताएं कि यह पारिवारिक सर्वे किस कानून के तहत किया गया था।" उन्होंने यह भी पूछा कि कोटा तय करने के मकसद से सर्वे के डेटा को प्रासंगिक क्यों माना जा सकता है।
बेंच ने यह भी गौर किया कि सरकार ने इस मुद्दे पर सौंपी गई कथित आयोग की रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया था, जबकि मामला अभी भी लंबित था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कार्यवाही में आयोग की वैधता की जांच नहीं की जा रही है क्योंकि किसी ने खुद आयोग को चुनौती नहीं दी थी।
सर्वे के कानूनी आधार पर स्पष्टीकरण मांगने और राज्य की दलीलें सुनने के बाद, बेंच ने याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से हाई कोर्ट का वह फ़ैसला बरकरार है जिसमें 20 अगस्त, 2026 के GO Ms No 105 और 19 अगस्त, 2026 के GO Rt No 1065 को रद्द कर दिया गया था। पहले आदेश में ग्रामीण स्थानीय निकायों (जैसे ग्राम पंचायत, मंडल प्रजा परिषद और ज़िला प्रजा परिषद) में BC आरक्षण को 34 प्रतिशत तक बहाल करने की बात कही गई थी, जिसमें संबंधित चुने हुए पद और क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र भी शामिल थे। दूसरे आदेश में शहरी स्थानीय निकायों (जैसे नगर निगम, नगरपालिका और नगर पंचायत) में 33.33 प्रतिशत BC आरक्षण लागू करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने इन आदेशों को इस आधार पर चुनौती दी थी कि अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और BCs के लिए कुल वर्टिकल आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में तय 50 प्रतिशत की सीमा से ज़्यादा हो जाएगा।
चीफ़ जस्टिस लिसा गिल और जस्टिस चल्ला गुणरंजन की हाई कोर्ट बेंच ने 1 अक्टूबर को कहा कि सरकार उन हालात में सीमा से ज़्यादा आरक्षण देने को सही ठहराने के लिए ज़रूरी ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रही है। कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि राज्य द्वारा इस्तेमाल किए गए 'यूनिफाइड फ़ैमिली सर्वे' को कुल सीमा से ज़्यादा BC आरक्षण देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य और जनहित अभियान बनाम भारत संघ के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का ज़िक्र करते हुए, हाई कोर्ट ने ज़ोर दिया कि 50 प्रतिशत की सीमा से किसी भी तरह के बदलाव के लिए मज़बूत तथ्यात्मक और सांख्यिकीय सबूत होने चाहिए। इसने 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले के फ़ैसले के सिद्धांत का भी सहारा लिया, जिसमें आरक्षण की सामान्य सीमा तय की गई थी। नतीजतन, हाई कोर्ट ने सरकार के उन दो आदेशों को उस हद तक रद्द कर दिया, जहाँ SCs, STs और BCs का कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज़्यादा हो रहा था। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को छह हफ़्ते के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य की अपील खारिज करने के बाद, वह निर्देश अभी भी लागू है। यह फ़ैसला सरकार को उन दो सरकारी आदेशों (GOs) के आधार पर बढ़ा हुआ आरक्षण लागू करने से रोकता है जिन्हें अब रद्द कर दिया गया है। स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए BC आरक्षण की मौजूदा 24 प्रतिशत व्यवस्था ही लागू रहेगी, बशर्ते इसके बाद ज़रूरी कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए जाएं।





