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आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने दिया सीबीआई जांच का आदेश, 25 लाख रुपये का मुआवजा

अमरावती: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को विजयवाड़ा के निवासी गाडे साईकृष्णा की हिरासत में हुई मौत के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने का आदेश दिया है। साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर उनकी मां, गाडे विजयालक्ष्मी को 25 लाख रुपये का मुआवजा दे।
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने शुक्रवार को अपना फैसला सुनाते हुए नई दिल्ली में CBI निदेशक को निर्देश दिया कि वे साईकृष्णा की मौत से जुड़ी परिस्थितियों के संबंध में तुरंत एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज करें। यह जांच CBI के किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए और इसे जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हिरासत में हिंसा के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले सभी अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार मुकदमा चलाया जाए।
खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को आदेश दिया कि वे इस मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड एक सप्ताह के भीतर एक विशेष दूत के माध्यम से CBI निदेशक को भेजें। इसके अलावा, अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ लागू सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करे।
यह फैसला एक ऐसे मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसने साईकृष्णा की मौत की परिस्थितियों और राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की जांच की पर्याप्तता पर सवाल खड़े किए हैं।
SIT की चार्जशीट के अनुसार, टास्क फोर्स पुलिस ने 6 मई, 2026 को मार्कापुरम इलाके से साईकृष्णा को कुछ लंबित गैर-जमानती वारंटों के सिलसिले में हिरासत में लिया था और बाद में उसे विजयवाड़ा के कृष्णलंका पुलिस स्टेशन ले गई। चार्जशीट में कहा गया है कि 12 मई की रात को पुलिस द्वारा दी गई यातना के कारण उसकी मौत हो गई।
साईकृष्णा के ठिकाने के बारे में पता न होने से उसका परिवार चिंतित था, जिसके चलते उसकी मां ने 4 जून को उच्च न्यायालय में 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की और उसे अदालत के सामने पेश करने का निर्देश देने की मांग की। बाद में यह मामला पुलिस की जवाबदेही और जांच के दायरे को लेकर एक व्यापक कानूनी विवाद में बदल गया।
साईकृष्णा के लापता होने के संबंध में 19 जून को एक मामला दर्ज किया गया था। उस समय कृष्णलंका के सर्कल इंस्पेक्टर रहे एस.एस.वी.वी. नागराजू को इस मामले में निलंबित कर दिया गया, गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस कांस्टेबलों सहित छह अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया। बाद में राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए एक SIT का गठन किया।
हालांकि, यह सवाल बना रहा कि क्या जांच में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की संभावित संलिप्तता की ठीक से पड़ताल की गई थी। YSRCP सांसद मड्डिला गुरुमूर्ति ने DGP हरीश कुमार गुप्ता, विजयवाड़ा पुलिस कमिश्नर एस.वी. राजशेखर बाबू और साउथ ज़ोन की ACP के. मानसा सहित वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की अलग से जांच की मांग की। उनकी निजी शिकायत पर शुरू हुई कार्यवाही के चलते एक अलग कानूनी लड़ाई छिड़ गई।
23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कई सवाल उठाए: हिरासत में लिए जाने के बाद साईकृष्णा को मजिस्ट्रेट के सामने क्यों पेश नहीं किया गया? उनके लापता होने की शिकायत मिलने के तुरंत बाद FIR क्यों दर्ज नहीं की गई? पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज क्यों उपलब्ध नहीं है? और उनका शव कहाँ है? कोर्ट ने संबंधित रिकॉर्ड एक सीलबंद लिफाफे में जमा करने का निर्देश दिया और इस कार्यवाही में CBI को भी शामिल कर लिया।
अब हाई कोर्ट द्वारा CBI जांच के आदेश दिए जाने के बाद, यह केंद्रीय एजेंसी साईकृष्णा की हिरासत और मौत से जुड़ी परिस्थितियों के साथ-साथ मामले से जुड़े सबूतों और रिकॉर्ड की जांच करेगी।





