लाइफ स्टाइल

लव मैरिज के बाद धोखा क्यों? प्रेमानंद महाराज ने दी सीख

nidhi
13 Oct 2026 1:15 PM IST
लव मैरिज के बाद धोखा क्यों? प्रेमानंद महाराज ने दी सीख
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महाराज का सवाल

लाइफस्टाइल : प्रेम विवाह करने के बाद भी रिश्ते में धोखा और अलगाव की स्थिति क्यों पैदा होती है? इसी सवाल पर प्रेमानंद महाराज ने दांपत्य जीवन में निष्ठा और जिम्मेदारी निभाने का संदेश दिया। उनका कहना है कि अपने मन से जीवनसाथी चुनने के बाद उसके प्रति समर्पण भी होना चाहिए। उन्होंने विवाह के बाद किसी अन्य व्यक्ति की ओर आकर्षित होने और साथी के विश्वास को तोड़ने वाले व्यवहार पर सवाल उठाया। रिश्ते की समस्याओं पर उनकी सीख अपने आचरण में सुधार करने और धर्म के अनुसार जीवन जीने की है।

उनके सामने एक व्यक्ति ने प्रेम विवाह के बाद पैदा होने वाली मुश्किलों का सवाल रखा था। उसने बताया कि कुछ जोड़े पहले एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और फिर विवाह कर लेते हैं। लेकिन बाद में साथी की धोखाधड़ी या किसी अन्य व्यक्ति से संबंध होने की बात सामने आती है। ऐसी परिस्थिति में विवाह करने वाला व्यक्ति मुश्किल में पड़ जाता है। सवाल का संदर्भ उन रिश्तों से था, जिनमें शादी के बाद विश्वास टूटता है और जीवनसाथी अपने निर्णय को लेकर परेशान हो जाता है।
इस पर प्रेमानंद महाराज ने प्रेम विवाह में प्रेम के अर्थ पर जोर दिया। उन्होंने पूछा कि अपनी पसंद से विवाह करने के बाद धोखा देने की स्थिति क्यों बननी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी को प्रेमपूर्वक स्वीकार करने का अर्थ उसके साथ जीवन निभाने की जिम्मेदारी लेना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “आप सुधार करो, आप धर्म से चलो।” उनकी सीख का केंद्र विवाह के बाद साथी के प्रति निष्ठावान रहना और अपने व्यवहार की गलतियों को ठीक करना था।
प्रेमानंद महाराज ने पारंपरिक विवाहों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि पहले कई विवाहों में वर और वधू शादी के समय ही एक-दूसरे को देखते थे, फिर भी जीवनभर साथ निभाते थे। यह उदाहरण देते हुए उन्होंने रिश्ते को निभाने के संकल्प का महत्व बताया। उनका सवाल था कि जब दो लोग पहले से एक-दूसरे को पसंद करते हैं और स्वयं विवाह का निर्णय लेते हैं, तो शादी के बाद उस स्वीकार्यता और समर्पण को क्यों भूल जाते हैं।
उन्होंने विवाह के बाद मनमाने आचरण पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता के साथ संबंध की जिम्मेदारी समझना जरूरी है। शादी के बाद भी व्यक्ति केवल अपनी इच्छा के अनुसार चलता रहे और साथी के प्रति प्रतिबद्धता को महत्व न दे, तो गृहस्थी प्रभावित होती है। उन्होंने धर्म का आश्रय लेने की बात इसी संदर्भ में कही। उनके विचार में विवाह को निभाने के लिए आचरण में मर्यादा और साथी के प्रति समर्पण होना चाहिए।
प्रेम और केवल इच्छा पर आधारित आकर्षण के बीच अंतर बताते हुए भी उन्होंने अपनी बात रखी। उनका कहना था कि कुछ संबंधों में प्रेम का नाम लिया जाता है, लेकिन व्यवहार में व्यक्तिगत इच्छाओं की प्रधानता होती है। जब उन इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आती है, तो व्यक्ति दूसरे संबंध की ओर देखने लगता है। उन्होंने ऐसे व्यवहार को गृहस्थी के लिए नुकसानदायक बताया। यह उनका धार्मिक दृष्टिकोण है, जिसमें संबंध की स्थिरता को निष्ठा और संयम से जोड़ा गया है।
उन्होंने साथी के त्याग और विवाह के लिए लिए गए निर्णय का सम्मान करने पर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, कोई व्यक्ति अपने परिवार से अलग होकर जीवनसाथी के पास आता है, तो उसके साथ होने वाला व्यवहार मायने रखता है। विवाह से पहले किए गए प्रेम के वादे शादी के बाद व्यवहार में दिखाई देने चाहिए। उनकी बात दोनों पक्षों की जिम्मेदारी से जुड़ी थी—जिसे स्वीकार किया है, उसके विश्वास के प्रति गंभीर रहना और संबंध में गलत आचरण से बचना।
एक अन्य प्रकाशित बयान में प्रेमानंद महाराज ने रिश्तों में भावनाएं डगमगाने और मन भटकने की स्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपनी पसंद से विवाह होने पर परिवार को भी उम्मीद रहती है कि रिश्ता मजबूत होगा। लेकिन जब साथी के प्रति भाव बदलते हैं और दूसरे व्यक्ति से जुड़ने की इच्छा होती है, तो संबंध में उलझन बढ़ती है। उन्होंने पुराने साथी से अलग होने के बाद नए संबंध में भी असंतोष पैदा होने का उदाहरण देकर धर्मानुसार जीवन जीने पर जोर दिया।
प्रेमानंद महाराज का यह संदेश प्रेम विवाह के बाद जिम्मेदारी निभाने से जुड़ा है। उन्होंने रिश्ते को केवल विवाह के निर्णय तक सीमित रखने के बजाय उसके बाद के आचरण को महत्वपूर्ण बताया। उनकी सलाह में साथी के विश्वास का सम्मान, अन्य संबंधों की ओर मन भटकने से बचना और अपनी गलतियों में सुधार करना प्रमुख बातें हैं। ये विचार उनके धार्मिक प्रवचन का हिस्सा हैं; इन्हें प्रत्येक टूटते रिश्ते की एक समान वजह बताने वाले निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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