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नींद और डिप्रेशन का समझें रिश्ता
Health Tips: अच्छी सेहत के लिए पर्याप्त नींद लेना बेहद जरूरी माना जाता है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि अगर वे रात में सात से आठ घंटे की नींद ले रहे हैं, तो सुबह उठने पर उनका शरीर पूरी तरह तरोताजा महसूस करेगा। लेकिन कई लोगों के साथ ऐसा नहीं होता। रातभर सोने के बावजूद सुबह आंख खुलते ही शरीर में भारीपन, आलस, थकान और मानसिक बेचैनी महसूस होने लगती है। दिनभर काम में मन नहीं लगता और बार-बार सोने की इच्छा होती है। अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो इसकी वजह केवल शारीरिक कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या भी हो सकती है। पर्याप्त नींद लेने के बावजूद थकान महसूस होना कई कारणों से जुड़ा हो सकता है। इनमें खराब नींद की गुणवत्ता, तनाव, अनियमित दिनचर्या, पोषण की कमी और डिप्रेशन शामिल हैं। खास बात यह है कि डिप्रेशन और नींद के बीच गहरा संबंध पाया जाता है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं।
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ (NIMH) के अनुसार, डिप्रेशन से प्रभावित लोगों में अत्यधिक थकान, ऊर्जा की कमी, अनिद्रा और सामान्य से अधिक सोने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि केवल थकान या अधिक नींद आने के आधार पर किसी व्यक्ति को डिप्रेशन का मरीज नहीं माना जा सकता। इसके लिए अन्य लक्षणों और उनकी अवधि का आकलन भी जरूरी है। दरअसल, नींद की गुणवत्ता उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी उसकी अवधि। कई बार व्यक्ति आठ से नौ घंटे बिस्तर पर बिताता है, लेकिन उसकी नींद बार-बार टूटती रहती है। इससे शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी के अनुसार, अच्छी नींद का मतलब केवल ज्यादा घंटे सोना नहीं है, बल्कि ऐसी नींद लेना है जिसके बाद व्यक्ति आराम और ताजगी महसूस करे। पर्याप्त समय सोने के बावजूद थकान रहना खराब नींद की गुणवत्ता का संकेत हो सकता है।
डिप्रेशन की स्थिति में व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और दैनिक गतिविधियों को करने के तरीके में बदलाव आ सकता है। लगातार उदासी, पहले पसंद आने वाले कामों में दिलचस्पी कम होना, निराशा, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं। इसके साथ ही नींद का पैटर्न भी बदल सकता है। कुछ लोगों को रातभर नींद नहीं आती, जबकि कुछ लोग सामान्य से ज्यादा सोने लगते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि मानसिक तनाव की स्थिति में व्यक्ति भले ही लंबे समय तक सोता रहे, लेकिन उसकी नींद संतोषजनक नहीं हो सकती। लगातार चिंता और नकारात्मक विचारों के कारण सोने से पहले मन शांत नहीं हो पाता। इसका असर अगले दिन की ऊर्जा, व्यवहार और कार्यक्षमता पर दिखाई दे सकता है।
नींद और डिप्रेशन का रिश्ता दोनों दिशाओं में काम कर सकता है। नींद की लगातार समस्या मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है, जबकि डिप्रेशन के कारण नींद में बदलाव आ सकता है। ऐसे में केवल ज्यादा देर सोना हमेशा समाधान नहीं होता। जरूरी है कि व्यक्ति अपनी मानसिक स्थिति और नींद की गुणवत्ता, दोनों पर ध्यान दे। हालांकि सुबह उठने के बाद लगातार थकान महसूस होने के पीछे डिप्रेशन के अलावा दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय सांस बार-बार रुकने या बाधित होने लगती है। इससे नींद प्रभावित होती है और व्यक्ति को अगले दिन अत्यधिक सुस्ती महसूस हो सकती है।
अमेरिका के नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, स्लीप एपनिया में तेज खर्राटे, नींद के दौरान सांस रुकना, बार-बार जागना और दिन में अत्यधिक नींद आने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे संकेत होने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। इसके अतिरिक्त खून की कमी, थायरॉइड संबंधी परेशानी, कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव और अन्य शारीरिक बीमारियां भी लगातार थकान का कारण बन सकती हैं। इसलिए लंबे समय तक बनी रहने वाली थकान को केवल आलस समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को लगातार उदासी महसूस होती है, किसी काम में रुचि नहीं रहती, सामान्य गतिविधियां बोझ लगने लगती हैं और नींद तथा भूख में बदलाव दिखाई देता है, तो इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। खासकर जब ऐसे लक्षण दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक बने रहें और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे, तब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। अच्छी नींद के लिए नियमित दिनचर्या अपनाना भी महत्वपूर्ण है। रोजाना लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की आदत डालें। सोने से पहले मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी का इस्तेमाल कम करें। शाम के बाद अधिक चाय-कॉफी पीने से बचें और बेडरूम का वातावरण शांत तथा आरामदायक रखें।
दिन में हल्की एक्सरसाइज, टहलना और सुबह प्राकृतिक रोशनी में कुछ समय बिताना भी नींद की दिनचर्या बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी और तनाव कम करने वाली गतिविधियों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। कई बार लोग लगातार थकान और उदासी से राहत पाने के लिए स्वयं नींद की गोलियां या अन्य दवाएं लेने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना चिकित्सकीय सलाह के ऐसी दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। अगर नींद की समस्या किसी मानसिक या शारीरिक बीमारी के कारण हो रही है, तो उसका उचित उपचार आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिप्रेशन कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि उपचार योग्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। समय रहते मदद लेने, काउंसलिंग और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार से स्थिति में सुधार संभव है। इसलिए अगर रातभर पर्याप्त नींद लेने के बावजूद रोजाना थकान महसूस होती है, सुबह उठने का मन नहीं करता और दिनभर मानसिक या शारीरिक ऊर्जा की कमी बनी रहती है, तो इन संकेतों को गंभीरता से लें। जरूरी नहीं कि इसके पीछे डिप्रेशन ही हो, लेकिन वास्तविक कारण का पता लगाना आवश्यक है।
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