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WHO का खुलासा भारत पाकिस्तान की जीवन प्रत्याशा में कितना फर्क
Ratna Netam
5 Oct 2026 3:28 PM IST

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नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान की औसत जीवन प्रत्याशा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ताजा आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। WHO की नई Global Health Estimates के मुताबिक वर्ष 2023 में भारत में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 71 साल रही, जबकि पाकिस्तान में यह आंकड़ा 68.2 साल था। यानी औसतन भारतीयों की जीवन प्रत्याशा पाकिस्तानियों की तुलना में करीब 2.8 साल अधिक रही। हालांकि, भारत अभी बांग्लादेश से पीछे है, जहां 2023 में औसत जीवन प्रत्याशा 72.7 साल दर्ज की गई।
WHO ने यह आंकड़े 2 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी नई Global Health Estimates रिपोर्ट में पेश किए हैं। रिपोर्ट में 2000 से 2023 तक दुनिया के अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में जीवन प्रत्याशा, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, मौत के कारणों और बीमारी के बोझ में आए बदलावों का आकलन किया गया है। WHO के अनुसार कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक जीवन प्रत्याशा में फिर से सुधार हुआ है और 2023 में यह 73.3 साल तक पहुंच गई, जो 2019 के 73.4 साल के स्तर के लगभग बराबर है।
भारत के आंकड़ों पर नजर डालें तो महामारी के दौरान जीवन प्रत्याशा में गिरावट आई थी। 2019 में भारत में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 70.5 साल थी, जो 2021 में घटकर 68.1 साल रह गई। इसके बाद 2022 में यह बढ़कर 70.5 साल और 2023 में 71 साल हो गई। यानी 2021 के निचले स्तर से दो साल में भारत ने अपनी औसत जीवन प्रत्याशा में करीब 2.9 साल की वापसी दर्ज की।
हालांकि, सिर्फ ज्यादा साल जीना ही पूरी तस्वीर नहीं बताता। WHO स्वस्थ जीवन प्रत्याशा यानी Healthy Life Expectancy या HALE को भी अलग से मापता है। भारत में 2023 में स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 60.6 साल रही। 2019 में यह 60.5 साल थी, जबकि 2021 में महामारी के दौरान यह घटकर 58.4 साल रह गई थी। 2022 में इसमें सुधार होकर यह 60.2 साल पहुंची और 2023 में 60.6 साल दर्ज की गई। इसका मतलब है कि जीवन के कुल वर्षों में सुधार अपेक्षाकृत तेज रहा, लेकिन पूरी तरह स्वस्थ रहने वाले वर्षों की वापसी उतनी तेज नहीं रही।
WHO की रिपोर्ट भारत में मौत के कारणों में आए बदलाव की तस्वीर भी सामने रखती है। आंकड़ों के अनुसार देश में अब गैर-संचारी रोग यानी Non-Communicable Diseases लगातार बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। 2023 में भारत के शीर्ष 10 मौत के कारणों से जुड़े मृत्यु दर में NCDs की हिस्सेदारी करीब 75 प्रतिशत पहुंच गई, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत रही। यह बदलाव 2000 की तुलना में काफी बड़ा है, जब शीर्ष 10 कारणों से जुड़े मृत्यु दर में संक्रामक रोगों की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी और NCDs की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत थी।
मौत की बड़ी वजहों में **इस्कीमिक हार्ट डिजीज यानी हृदय की कोरोनरी बीमारी** प्रमुख रूप से सामने आई है। उपलब्ध WHO आंकड़ों के आधार पर 2023 में भारत में इस बीमारी से जुड़ी मृत्यु दर 1 लाख आबादी पर करीब 138.5 रही। इसके बाद क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी COPD की दर करीब 83.19, स्ट्रोक की 74.8 और डायबिटीज की 49.01 रही। इससे पता चलता है कि भारत में हृदय रोग, फेफड़ों की पुरानी बीमारी, स्ट्रोक और मधुमेह जैसे लंबे समय तक चलने वाले रोग मृत्यु के बड़े कारणों में शामिल हो गए हैं।
यह बदलाव भारत के स्वास्थ्य प्रोफाइल में आ रहे व्यापक परिवर्तन की ओर भी इशारा करता है। पहले संक्रामक रोगों का दबाव ज्यादा था, लेकिन अब देश में जीवनशैली, बढ़ती उम्र और लंबे समय तक रहने वाली बीमारियों से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम अधिक महत्वपूर्ण हो रहे हैं। WHO की वैश्विक रिपोर्ट भी बताती है कि 2023 में दुनिया भर में मौत के शीर्ष 10 कारणों में से आठ गैर-संचारी रोग थे। इनमें इस्कीमिक हार्ट डिजीज सबसे बड़ी वजह रही, जिससे दुनिया में करीब 9.5 मिलियन मौतें हुईं।
भारत और पाकिस्तान के बीच जीवन प्रत्याशा का अंतर कई सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतकों से जुड़ा व्यापक विषय है, लेकिन WHO के आंकड़े केवल औसत आबादी की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हर भारतीय व्यक्ति हर पाकिस्तानी व्यक्ति से ज्यादा उम्र जिएगा। जीवन प्रत्याशा एक सांख्यिकीय औसत है, जो किसी देश की पूरी आबादी के मृत्यु पैटर्न के आधार पर अनुमानित होती है। WHO यह भी स्पष्ट करता है कि कुछ देशों में मृत्यु के कारणों के आंकड़े सीधे उपलब्ध न होने के कारण मॉडलिंग और विभिन्न स्रोतों का इस्तेमाल किया जाता है।
WHO ने यह भी बताया है कि भारत समेत कई देशों में कारण-विशिष्ट मृत्यु के अनुमान को सावधानी से समझने की जरूरत है। भारत के मामले में मृत्यु पंजीकरण से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता संबंधी सीमाओं के कारण WHO अलग-अलग स्रोतों और सांख्यिकीय मॉडलों का इस्तेमाल करता है। इसलिए ये आंकड़े स्वास्थ्य नीति और प्राथमिकताएं तय करने में उपयोगी हैं, लेकिन इन्हें आधिकारिक मृत्यु प्रमाणपत्रों के सीधे विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 60 साल की उम्र तक पहुंच चुके भारतीयों के लिए 2023 में औसतन 18.8 साल और जीवन की उम्मीद थी। इनमें करीब 13.7 साल स्वस्थ जीवन के रहने का अनुमान था। 2019 में 60 साल की उम्र पर शेष जीवन प्रत्याशा 18.4 साल थी। यानी बुजुर्ग आबादी के लिए भी कुल जीवन अवधि में मामूली सुधार देखा गया है, लेकिन स्वस्थ जीवन के वर्षों को बढ़ाना अब एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
कुल मिलाकर, WHO की ताजा रिपोर्ट दक्षिण एशिया में भारत की स्वास्थ्य स्थिति की एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है। भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 2023 में 71 साल रही, जो पाकिस्तान के 68.2 साल से अधिक है, लेकिन बांग्लादेश के 72.7 साल से कम है। वहीं भारत में मौत की प्रमुख वजहों में अब हृदय रोग और अन्य गैर-संचारी बीमारियां तेजी से आगे आ चुकी हैं। जीवन प्रत्याशा बढ़ने के साथ स्वस्थ जीवन के वर्षों को बढ़ाना और हृदय रोग, स्ट्रोक, COPD तथा डायबिटीज जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों को कम करना आने वाले समय में स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती रहेगी।
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