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Lifestyle, लाइफस्टाइल : लेटेंट ऑटोइम्युन डायबिटीज इन एडल्ट्स (LADA) को आमतौर पर टाइप 1.5 डायबिटीज कहा जाता है। यह डायबिटीज का ऐसा प्रकार है जिसे समझना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि इसके लक्षण टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज दोनों से मिलते-जुलते हैं। यही कारण है कि कई बार लोग इसे टाइप 1 डायबिटीज समझकर सही समय पर इलाज नहीं करा पाते।
विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप 1.5 डायबिटीज में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं पर हमला करती है। यह टाइप 1 डायबिटीज जैसी ऑटोइम्युन प्रतिक्रिया है। लेकिन इसमें मुख्य अंतर यह है कि यह आमतौर पर वयस्कों में धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए टाइप 2 जैसी धीमी प्रगति वाला रूप नजर आता है।
टाइप 1.5 के लक्षणों में थकान, बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन कम होना और अत्यधिक प्यास शामिल हैं। चूंकि यह धीरे बढ़ता है, शुरुआती दौर में मरीजों में अधिकतर कोई गंभीर लक्षण नजर नहीं आते। इस वजह से लोग इसे टाइप 2 समझ बैठते हैं और डाइट या जीवनशैली पर ध्यान देने के अलावा, सही इंसुलिन या इलाज में देरी हो जाती है।
अध्ययन बताते हैं कि टाइप 1.5 डायबिटीज में इंसुलिन की आवश्यकता टाइप 2 की तुलना में जल्दी बढ़ती है। यदि समय पर इसका पता नहीं लगाया गया तो मरीज में ब्लड शुगर नियंत्रित करने में समस्या बढ़ जाती है और हृदय, किडनी और अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि वयस्कों में अचानक या असामान्य तरीके से ब्लड शुगर बढ़ने पर डॉक्टर से सही परीक्षण कराना जरूरी है।
डायग्नोसिस में ग्लूकोज लेवल के साथ-साथ एंटीबॉडी टेस्ट की मदद ली जाती है। LADA के मरीजों में GAD (ग्लूटमिक एसिड डिकार्बॉक्सिलेज) एंटीबॉडी पाए जाते हैं, जो टाइप 1.5 डायबिटीज की पहचान में मदद करते हैं। इस प्रकार का टेस्ट ही टाइप 2 और टाइप 1.5 में अंतर बताता है।
इलाज के लिए डॉक्टर मरीज की ब्लड शुगर स्टडी और एंटीबॉडी रिपोर्ट के आधार पर इंसुलिन थैरेपी या अन्य दवा सुझाते हैं। शुरुआती स्तर पर जीवनशैली सुधार, सही खानपान और नियमित व्यायाम भी मददगार होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर पहचान और इलाज से टाइप 1.5 डायबिटीज के मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं और गंभीर जटिलताओं से बच सकते हैं।
समाप्त करते हुए, यह स्पष्ट है कि टाइप 1.5 डायबिटीज वयस्कों में एक छिपा हुआ खतरा है। इसके लक्षणों को नजरअंदाज करना और इसे टाइप 2 समझना जीवन के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए वयस्कों में धीरे-धीरे बढ़ती शुगर, बार-बार पेशाब और अचानक वजन घटने जैसे लक्षणों को गंभीरता से लेना चाहिए और समय पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
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