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3 महान ग्रंथों का दुनिया में बजा डंका, UNESCO की सूची में महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी शामिल

nidhi
6 Nov 2026 11:09 AM IST
3 महान ग्रंथों का दुनिया में बजा डंका, UNESCO की सूची में महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी शामिल
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नई दिल्ली: भारतीय सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। भारत के तीन महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रंथों—महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी—की पांडुलिपियों को यूनेस्को के 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर' में शामिल किया गया है। इस उपलब्धि को भारतीय साहित्य, इतिहास और बौद्धिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक की 11वीं बैठक में इन पांडुलिपियों को क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल करने का फैसला लिया गया। इसके साथ इस रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है। महाभारत भारतीय साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण महाकाव्य है। परंपरागत रूप से इसकी रचना महर्षि वेदव्यास से जुड़ी मानी जाती है। यह ग्रंथ केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय, राजनीति, परिवार और मानवीय संबंधों से जुड़े गहरे प्रश्नों को भी सामने रखता है।
महाभारत का सबसे प्रसिद्ध हिस्सा श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद के माध्यम से कर्म, ज्ञान और जीवन दर्शन की व्याख्या की गई है। सदियों से महाभारत भारतीय समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारों का महत्वपूर्ण आधार रहा है। दूसरा ग्रंथ कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। इसे प्राचीन भारत में शासन व्यवस्था, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और कूटनीति से संबंधित महत्वपूर्ण रचना माना जाता है। कौटिल्य को चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है।
अर्थशास्त्र में राज्य संचालन, कर व्यवस्था, व्यापार, कानून, राजस्व, सुरक्षा और विदेश नीति जैसे अनेक विषयों की विस्तृत चर्चा मिलती है। यह ग्रंथ दर्शाता है कि प्राचीन भारत में शासन और अर्थव्यवस्था को लेकर व्यवस्थित चिंतन की समृद्ध परंपरा मौजूद थी। तीसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ राजतरंगिणी है, जिसकी रचना 12वीं शताब्दी में इतिहासकार कल्हण ने की थी। यह संस्कृत भाषा में रचित ऐतिहासिक काव्य है, जिसमें कश्मीर के विभिन्न राजाओं और उनके शासनकाल का वर्णन मिलता है।
राजतरंगिणी की विशेषता यह है कि इसमें राजाओं की वंशावली के साथ राजनीतिक घटनाओं, संघर्षों और प्रशासनिक परिस्थितियों को भी दर्ज किया गया है। इस वजह से इसे कश्मीर के इतिहास के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है।
यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम महत्वपूर्ण दस्तावेजों और पांडुलिपियों जैसी ऐतिहासिक धरोहरों को पहचान दिलाने तथा उनके संरक्षण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संचालित किया जाता है। एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में किसी पांडुलिपि को शामिल किया जाना उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता की क्षेत्रीय मान्यता है। इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची या अंतरराष्ट्रीय मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर से अलग समझना चाहिए। इन तीनों भारतीय ग्रंथों का क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारत की साहित्यिक और बौद्धिक परंपराएं आज भी दुनिया के लिए अध्ययन और संरक्षण का महत्वपूर्ण विषय बनी हुई हैं।
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