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पति की ये आदत शादीशुदा जिंदगी में ला सकती है तनाव

nidhi
4 Nov 2026 11:41 AM IST
पति की ये आदत शादीशुदा जिंदगी में ला सकती है तनाव
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Relationship Tips: शादी के बाद पति-पत्नी का रिश्ता प्यार, भरोसे और आपसी समझ से मजबूत बनता है। दोनों मिलकर अपनी जिंदगी के छोटे-बड़े फैसले लेते हैं और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं। लेकिन कई बार पति की कही एक साधारण-सी बात पत्नी के मन में नाराजगी पैदा कर सकती है। ऐसी ही एक लाइन है—'मम्मी से पूछकर बताऊंगा।'
सुनने में यह बात बिल्कुल सामान्य लगती है। आखिर माता-पिता से सलाह लेना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन जब पति हर छोटे-बड़े फैसले में पत्नी से बात करने के बजाय अपनी मां की अनुमति को अंतिम मानने लगे, तो पत्नी को महसूस हो सकता है कि रिश्ते में उसकी राय की अहमियत कम है। हर परिवार और परिस्थिति अलग होती है। समस्या मां से सलाह लेने में नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच फैसले लेने की प्रक्रिया में बराबरी और संवाद की कमी होने पर पैदा होती है।
पत्नी को क्यों चुभ जाती है यह बात?
शादी के बाद अधिकांश महिलाएं चाहती हैं कि उनका जीवनसाथी उनकी बात सुने, उनकी भावनाओं को समझे और महत्वपूर्ण फैसलों में उन्हें बराबर की भागीदारी दे।
मान लीजिए पत्नी पति से कहती है कि इस बार दोनों कुछ दिनों के लिए घूमने चलें। जवाब में पति तुरंत कह देता है, 'मम्मी से पूछकर बताऊंगा।' अगर यात्रा की योजना से परिवार की जिम्मेदारियां प्रभावित हो रही हैं, तो घर के अन्य सदस्यों से बातचीत करना स्वाभाविक है। लेकिन अगर हर निजी योजना पर पति पहले मां की अनुमति लेना जरूरी समझता है, तो पत्नी के मन में कई सवाल उठ सकते हैं।
उसे लग सकता है कि क्या उसका पति अपने फैसले खुद नहीं ले सकता? क्या उसकी इच्छाओं से ज्यादा महत्व किसी दूसरे की सहमति का है?
यहीं से रिश्ते में नाराजगी और गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं।
मां का सम्मान करना और पत्नी को महत्व देना अलग बातें नहीं
कई बार पति को लगता है कि मां की सलाह लेना उनका सम्मान करना है। यह सोच अपने आप में गलत नहीं है। माता-पिता का अनुभव जीवन के कई फैसलों में उपयोगी साबित हो सकता है।
लेकिन शादी के बाद पति-पत्नी भी एक स्वतंत्र साझेदारी बनाते हैं। उनकी अपनी जरूरतें, जिम्मेदारियां और निजी फैसले होते हैं।
ऐसे में पति को समझना चाहिए कि मां का सम्मान करने के लिए पत्नी की राय को नजरअंदाज करना जरूरी नहीं है। इसी तरह पत्नी को प्राथमिकता देने का अर्थ माता-पिता से दूरी बनाना भी नहीं है।
स्वस्थ पारिवारिक रिश्ते में दोनों संबंधों को उचित सम्मान और स्थान दिया जा सकता है।
हर फैसले में तीसरे व्यक्ति की राय बन सकती है परेशानी
पति-पत्नी के बीच कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिन्हें दोनों आपस में बातचीत करके आसानी से ले सकते हैं।
उदाहरण के लिए घूमने की योजना बनाना, घर की खरीदारी, बचत का लक्ष्य तय करना या निजी समय बिताने का फैसला करना।
यदि इन मामलों में हर बार परिवार के किसी तीसरे सदस्य की अनुमति अनिवार्य हो जाए, तो दंपती के बीच स्वतंत्रता की कमी महसूस हो सकती है।
इससे पत्नी को लग सकता है कि पति उसकी बात सुनने के बावजूद अंतिम फैसला किसी और के कहने पर ही लेगा।
हालांकि, संयुक्त परिवार में साझा खर्च, बुजुर्गों की देखभाल या पारिवारिक जिम्मेदारियों से जुड़े निर्णयों में सभी प्रभावित सदस्यों की राय लेना उचित हो सकता है।
पत्नी के मन में पैदा हो सकती है असुरक्षा
जब किसी व्यक्ति को बार-बार महसूस होता है कि उसकी राय को महत्व नहीं दिया जा रहा, तो उसके आत्मविश्वास और रिश्ते के प्रति भरोसे पर असर पड़ सकता है।
पत्नी के मन में यह भावना पैदा हो सकती है कि वह पति की जिंदगी में महत्वपूर्ण फैसलों की साझेदार नहीं है।
समय के साथ यह नाराजगी छोटी-छोटी बहसों का कारण बन सकती है। पति को लग सकता है कि पत्नी उसकी मां से समस्या रखती है, जबकि पत्नी की असली शिकायत निर्णय लेने में अपनी भागीदारी को लेकर हो सकती है।
ऐसी स्थिति में दोनों को एक-दूसरे की बात बिना आरोप लगाए समझने की कोशिश करनी चाहिए।
पति को क्या कहना चाहिए?
हर बार 'मम्मी से पूछकर बताऊंगा' कहने के बजाय पति परिस्थिति के अनुसार अलग तरीके से अपनी बात रख सकता है।
उदाहरण के लिए—
- 'पहले हम दोनों मिलकर तय करते हैं।'
- 'तुम्हारी राय मेरे लिए जरूरी है।'
- 'इससे घर की जिम्मेदारियां प्रभावित होंगी, इसलिए सबके साथ बात कर लेते हैं।'
- 'मुझे थोड़ा समय दो, हम आराम से फैसला करेंगे।'
इन जवाबों से पत्नी को यह भरोसा मिल सकता है कि उसकी बात सुनी जा रही है और निर्णय में उसकी भागीदारी है।
पत्नी को भी समझना चाहिए पति की स्थिति
किसी भी रिश्ते में केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं होती। पत्नी को भी यह समझना चाहिए कि पति के जीवन में माता-पिता का अपना महत्व है।
यदि किसी फैसले से बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, घर की आर्थिक स्थिति या परिवार की अन्य जिम्मेदारियां जुड़ी हैं, तो उनसे सलाह लेना स्वाभाविक है।
इसलिए पति के हर बार मां का जिक्र करने को अपनी उपेक्षा समझना भी सही नहीं होगा।
बेहतर तरीका यह है कि पत्नी शांतिपूर्वक पति को बताए कि किन परिस्थितियों में उसे अपनी राय नजरअंदाज होने का एहसास होता है।
रिश्ते में कड़वाहट आने से कैसे रोकें?
पति-पत्नी को समय निकालकर एक-दूसरे से खुलकर बातचीत करनी चाहिए। उन्हें यह तय करना चाहिए कि कौन-से फैसले दोनों मिलकर लेंगे और किन विषयों पर परिवार के अन्य सदस्यों की सलाह जरूरी होगी।
रिश्ते में तुलना करने, एक-दूसरे के परिवार पर आरोप लगाने या नाराजगी को लंबे समय तक दबाकर रखने से बचना चाहिए।
अगर मतभेद बार-बार गंभीर झगड़ों में बदल रहे हैं, तो दंपती किसी प्रशिक्षित मैरिज काउंसलर की सहायता भी ले सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्नी को महत्व देने के लिए पति को अपनी मां का सम्मान कम करने की जरूरत नहीं है। एक परिपक्व रिश्ता वही है, जिसमें परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने के साथ जीवनसाथी की भावनाओं और फैसलों का भी सम्मान किया जाए।
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