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वंदे मातरम् की अनोखी कहानी आजादी के दीवानों की जुबान पर था ये गीत
nidhi
19 Aug 2026 8:24 AM IST

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अंग्रेजों के खिलाफ गूंजा वंदे मातरम् आजादी की लड़ाई का अमर नारा
नई दिल्ली: भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कई ऐसे प्रतीक रहे, जिन्होंने लोगों में देशभक्ति और एकता की भावना को मजबूत किया। इन्हीं में से एक था ‘वंदे मातरम्’, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के दौरान करोड़ों भारतीयों में आजादी का जुनून पैदा किया। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बन गया था।
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके शब्दों ने लोगों को अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण और बलिदान की भावना से जोड़ा। आज भी यह गीत देश के गौरव और राष्ट्रीय भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की रचना
‘वंदे मातरम्’ की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इसे पहली बार उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। यह गीत धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हुआ और स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बन गया।
इस गीत में भारत माता को मां के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसकी पंक्तियों ने लोगों के भीतर अपनी भूमि के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना को जागृत किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में बनी ताकत
ब्रिटिश शासन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख उद्घोष बन गया था। आंदोलनकारी रैलियों, सभाओं और विरोध प्रदर्शनों में इसे जोश के साथ गाते थे। अंग्रेजी शासन ने कई बार इस नारे पर रोक लगाने की कोशिश की, लेकिन लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।
कई स्वतंत्रता सेनानी जेल जाते समय और आंदोलनों के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते थे। यह उनके लिए हिम्मत और संघर्ष का प्रतीक बन चुका था।
राष्ट्रवाद का प्रतीक बना बैज और चिन्ह
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई देशभक्त ‘वंदे मातरम्’ लिखे बैज, झंडे और अन्य प्रतीक धारण करते थे। इन प्रतीकों के जरिए वे अपनी देशभक्ति और अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध को व्यक्त करते थे।
युवाओं और क्रांतिकारियों के बीच ‘वंदे मातरम्’ का विशेष प्रभाव था। इसे पहनना या बोलना उस दौर में साहस और राष्ट्रप्रेम का संदेश माना जाता था।
कांग्रेस अधिवेशन में मिला सम्मान
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को सार्वजनिक रूप से गाया गया। इसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख गीतों में शामिल हो गया।
1947 में आजादी मिलने के बाद भी ‘वंदे मातरम्’ का महत्व कायम रहा। संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत का सम्मान दिया, जबकि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया।
आज भी कायम है महत्व
आज ‘वंदे मातरम्’ भारत की राष्ट्रीय भावना और गौरव का प्रतीक है। स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों और राष्ट्रीय आयोजनों में इसे सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
इसकी यात्रा केवल एक गीत की यात्रा नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति की भावना की कहानी है। जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपनी पहचान बनाया, उनके लिए ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक था।
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