लाइफ स्टाइल

दादी-नानी के ज्ञान में छिपा था वैज्ञानिक कारण

Kanchan Paikara
3 July 2026 2:57 PM IST
दादी-नानी के ज्ञान में छिपा था वैज्ञानिक कारण
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Lifestyle | लाइफ स्टाइल : आज के समय में घरों की दीवारों पर पेंट और फर्श पर मार्बल या टाइल्स का इस्तेमाल आम हो गया है। सफाई के लिए फिनाइल और अन्य केमिकल उत्पादों का उपयोग किया जाता है। लेकिन कुछ दशक पहले तक तस्वीर बिल्कुल अलग थी। उस समय घरों की दीवारों और फर्श की नियमित रूप से गोबर, मिट्टी और भूसे के मिश्रण से लिपाई की जाती थी। यह परंपरा केवल एक रिवाज नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कई व्यावहारिक और प्राकृतिक कारण छिपे थे।
पुराने समय में महिलाएं समय-समय पर घर की लिपाई करती थीं। ग्रामीण इलाकों में आज भी कुछ स्थानों पर यह परंपरा देखने को मिल जाती है, हालांकि अब यह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। लिपाई के लिए गाय के गोबर, मिट्टी और भूसे का मिश्रण तैयार किया जाता था, जिसे दीवारों और फर्श पर लगाया जाता था।
इस पारंपरिक पद्धति का सबसे बड़ा फायदा यह था कि यह प्राकृतिक रूप से घर को ठंडा रखने में मदद करती थी। मिट्टी और गोबर की परत गर्मी को अंदर आने से रोकती थी, जिससे गर्मियों में घर का तापमान सामान्य बना रहता था। यही कारण था कि पुराने घरों में एसी या कूलर की जरूरत कम महसूस होती थी।
इसके अलावा गोबर में मौजूद प्राकृतिक तत्व बैक्टीरिया और कीटाणुओं को खत्म करने में मदद करते थे। माना जाता है कि गोबर की लिपाई घर को स्वच्छ और संक्रमण मुक्त रखने में सहायक होती थी। इसी वजह से इसे एक तरह का प्राकृतिक डिसइंफेक्टेंट भी माना जाता था।
लिपाई की एक और खास बात यह थी कि यह पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित और सस्ती पद्धति थी। इसमें किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं होता था, जिससे न तो प्रदूषण होता था और न ही कोई हानिकारक प्रभाव पड़ता था। साथ ही, यह ग्रामीण परिवारों के लिए एक कम खर्च वाला विकल्प भी था।
इसके अलावा यह परंपरा घर की सुंदरता और पवित्रता से भी जुड़ी मानी जाती थी। त्योहारों और विशेष अवसरों पर घर की लिपाई कर उसे साफ-सुथरा और आकर्षक बनाया जाता था। इससे घर में एक अलग ही ताजगी और सकारात्मक माहौल महसूस होता था।
हालांकि समय के साथ आधुनिक निर्माण सामग्री और सुविधाओं के बढ़ने से यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। अब शहरों के साथ-साथ कई गांवों में भी पेंट और टाइल्स ने इसकी जगह ले ली है।
फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि गोबर-मिट्टी की लिपाई में मौजूद प्राकृतिक गुण आज भी उपयोगी हो सकते हैं, खासकर पर्यावरण अनुकूल निर्माण और पारंपरिक ज्ञान को समझने के लिहाज से।
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