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‘रमती आवे माड़ी’ की दमदार धुन, जानें गुजरात की डाकला परंपरा से इसका रिश्ता
nidhi
15 Oct 2026 11:35 AM IST

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गरबा की महफिल में जोश भरने वाला गीत
लाइफस्टाइल: नवरात्र के आयोजनों में कुछ धुनें ऐसी होती हैं, जिनकी थाप सुनते ही लोगों के कदम तेज हो जाते हैं। गुजरात की डाकला परंपरा से जुड़ा ‘रमती आवे माड़ी रमती आवे’ ऐसा ही एक लोकगीत है। इसकी पहचान देवी के आह्वान और दमदार ताल से जुड़ी है। आज इसके आधुनिक संगीत वाले रूप भी सुनाई देते हैं, लेकिन इसकी जड़ें लोक आस्था और पारंपरिक गायन में हैं। इसलिए इसे समझने के लिए केवल इसकी तेज लय नहीं, बल्कि इसके सांस्कृतिक संदर्भ को भी जानना जरूरी है।
‘रमती आवे’ का संबंध गुजरात के कच्छ क्षेत्र की डाकला लोकसंगीत परंपरा से बताया जाता है। पारंपरिक गायक हामिद सामा के अनुसार, यह गीत माता मेलड़ी को समर्पित है। लोक विश्वास में माता मेलड़ी को खेतों और पशुधन की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। गीत में देवी के आगमन और उनकी आराधना का भाव मौजूद है। इसके पारंपरिक रूप में गायन के साथ एक प्रमुख वाद्य ‘डाक’ की संगत होती थी।
डाकला या डाकलू नाम से पहचाना जाने वाला वाद्य डमरू वर्ग का तालवाद्य है। इसका बीच का भाग पतला और दोनों सिरे अपेक्षाकृत चौड़े होते हैं। भारतीय संगीत के अध्येता डेविड कोर्टनी इसे गुजरात में प्रचलित वाद्य बताते हैं। इसी वाद्य की आवाज और ताल डाकला प्रस्तुतियों को खास पहचान देती है। गायन और तालवादन के मेल में शब्दों के साथ थाप की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहती है।
कच्छ की लोकसंगीत परंपरा में डाकलू अकेला वाद्य नहीं है। क्षेत्र में शहनाई, नगाड़ा, मंजीरा, खंजरी, ढोलक और दूसरे अनेक वाद्य भी इस्तेमाल होते हैं। कच्छ जिला प्रशासन की सांस्कृतिक जानकारी में इन वाद्यों को स्थानीय जीवन और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा बताया गया है। इस व्यापक संगीत संसार के बीच डाकला की अपनी अलग ध्वनि और अनुष्ठानिक पहचान विकसित हुई है।
डाकला को हर तेज गुजराती गीत या गरबा धुन का पर्याय मान लेना सही नहीं होगा। इसकी प्रस्तुतियों का संबंध देवी आराधना और स्थानीय समुदायों की धार्मिक परंपराओं से भी रहा है। समय के साथ मंचीय आयोजनों में इसकी धुनों का इस्तेमाल बढ़ा और पारंपरिक संगीत के साथ नए वाद्य तथा इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियां जुड़ती गईं। इससे आज सुनाई देने वाली प्रस्तुति और पुराने लोकगायन के बीच अंतर भी पैदा हुआ है।
आधुनिक प्रस्तुतियों में डाकला को नया रूप देने वालों में मयूर नरवेकर का बैंडिश प्रोजेक्ट भी शामिल है। वर्ष 2016 में ‘डाकला-1’ के जरिए गुजराती लोक कलाकारों के साथ इलेक्ट्रॉनिक संगीत का मेल प्रस्तुत किया गया था। ऐसे प्रयोगों से इस संगीत को नए श्रोताओं तक पहुंचने का रास्ता मिला। हालांकि, लोककलाओं की शोधकर्ता उत्पला देसाई ने चिंता जताई है कि आधुनिक प्रस्तुतियों की लोकप्रियता के बीच पारंपरिक कलाकारों और मूल शैली को पर्याप्त जगह नहीं मिल रही।
इस नवरात्र गुरदीप मेहंदी का गुजराती गीत ‘मावड़ी’ भी डाकला शैली की समकालीन प्रस्तुति का उदाहरण है। सारेगामा द्वारा प्रस्तुत इस गीत में पारंपरिक डाकला और आधुनिक संगीत को मिलाया गया है। गुरदीप ने कहा कि अपना गुजराती गीत गाना उनकी लंबे समय से इच्छा थी। उन्होंने गुजराती संस्कृति, लोगों की गर्मजोशी और त्योहारों की ऊर्जा के प्रति अपने लगाव का भी उल्लेख किया।
‘मावड़ी’ और ‘रमती आवे’ को एक ही गीत नहीं समझना चाहिए। दोनों का उल्लेख डाकला से जुड़े संगीत के संदर्भ में होता है, लेकिन उनकी प्रस्तुतियां और पहचान अलग हैं। नवरात्र में ऐसी धुनें सुनते समय उनके गायक, वादक और लोक परंपरा को जानना उत्सव के अनुभव को और समृद्ध बनाता है। दमदार थाप के पीछे कलाकारों का अभ्यास और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृति भी मौजूद है।
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