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Lifestyle लाइफ स्टाइल : अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) को आमतौर पर एक ऐसी स्थिति माना जाता है जो सिर्फ शरारती या उछल-कूद करने वाले लड़कों में होती है। लेकिन हाल ही में आई एक नई स्टडी ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। स्टडी का दावा है कि जो लड़कियां घर और समाज में बिल्कुल शांत, आज्ञाकारी और 'परफेक्ट' यानी 'अच्छी बेटी' की तरह व्यवहार कर रही हैं, वे असल में अंदर ही अंदर ADHD से जूझ रही हो सकती हैं। लड़कियों में इसके लक्षण इतने छिपे हुए होते हैं कि माता-पिता और टीचर्स भी इसे सामान्य व्यवहार समझकर अनदेखा कर देते हैं, जिसके आगे चलकर गंभीर नुकसान होते हैं।
लड़कों से अलग हैं लड़कियों के लक्षण
आमतौर पर लड़कों में हाइपरएक्टिविटी (Hyperactivity) यानी अत्यधिक शारीरिक चंचलता देखी जाती है, जिससे उनका ADHD तुरंत पकड़ में आ जाता है। इसके विपरीत, लड़कियों में 'इनअटेंटिव ADHD' (Inattentive ADHD) के लक्षण ज़्यादा होते हैं। वे बाहर से शांत दिखती हैं, लेकिन उनका दिमाग एक जगह टिक नहीं पाता। वे क्लास में बैठकर भी कहीं और खोई रहती हैं (Daydreaming), बातों को भूल जाती हैं और किसी भी काम को व्यवस्थित ढंग से करने में उन्हें भारी मानसिक प्रयास करना पड़ता है। चूँकि वे किसी को परेशान नहीं करतीं, इसलिए उनके इस व्यवहार को 'शांत स्वभाव' मान लिया जाता है।
'परफेक्ट' दिखने का मुखौटा (Masking)
लड़कियों पर बचपन से ही समाज और परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने और एक 'आदर्श बेटी' बनने का सामाजिक दबाव होता है। इस दबाव के कारण वे अपनी कमियों और मानसिक संघर्ष को छुपाने में माहिर हो जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में 'मास्किंग' (Masking) कहा जाता है। वे खुद को हर काम में परफेक्ट दिखाने के लिए अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा झोंक देती हैं। वे रात-रात भर जागकर पढ़ाई करेंगी या अपनी चीज़ों को सहेजने के लिए अत्यधिक तनाव लेंगी, ताकि कोई उन पर उंगली न उठा सके। उनका यह 'अच्छा व्यवहार' ही उनके डिसऑर्डर का सबसे बड़ा छुपाने वाला कवच बन जाता है।
देर से पहचान होने के गंभीर नुकसान
स्टडी के अनुसार, लक्षणों की अनदेखी का सबसे बुरा असर लड़कियों की मानसिक सेहत पर पड़ता है। लड़कों का डायग्नोसिस (पहचान) बचपन में ही हो जाता है, जबकि लड़कियों का ADHD अक्सर कॉलेज जाने या नौकरी शुरू करने की उम्र तक सामने नहीं आता। इतने लंबे समय तक बिना किसी मदद के अकेले संघर्ष करने के कारण, बड़ी होने पर इन लड़कियों में गंभीर एंग्जायटी (घबराहट), डिप्रेशन (अवसाद) और लो सेल्फ-एस्टीम (आत्म-संदेह) का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। वे खुद को हमेशा दूसरों से कमतर और असफल मानने लगती हैं, जिससे उनका करियर और व्यक्तिगत जीवन दोनों प्रभावित होते हैं। अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) को आमतौर पर एक ऐसी स्थिति माना जाता है जो सिर्फ शरारती या उछल-कूद करने वाले लड़कों में होती है। लेकिन हाल ही में आई एक नई स्टडी ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। स्टडी का दावा है कि जो लड़कियां घर और समाज में बिल्कुल शांत, आज्ञाकारी और 'परफेक्ट' यानी 'अच्छी बेटी' की तरह व्यवहार कर रही हैं, वे असल में अंदर ही अंदर ADHD से जूझ रही हो सकती हैं। लड़कियों में इसके लक्षण इतने छिपे हुए होते हैं कि माता-पिता और टीचर्स भी इसे सामान्य व्यवहार समझकर अनदेखा कर देते हैं, जिसके आगे चलकर गंभीर नुकसान होते हैं।
लड़कों से अलग हैं लड़कियों के लक्षण
आमतौर पर लड़कों में हाइपरएक्टिविटी (Hyperactivity) यानी अत्यधिक शारीरिक चंचलता देखी जाती है, जिससे उनका ADHD तुरंत पकड़ में आ जाता है। इसके विपरीत, लड़कियों में 'इनअटेंटिव ADHD' (Inattentive ADHD) के लक्षण ज़्यादा होते हैं। वे बाहर से शांत दिखती हैं, लेकिन उनका दिमाग एक जगह टिक नहीं पाता। वे क्लास में बैठकर भी कहीं और खोई रहती हैं (Daydreaming), बातों को भूल जाती हैं और किसी भी काम को व्यवस्थित ढंग से करने में उन्हें भारी मानसिक प्रयास करना पड़ता है। चूँकि वे किसी को परेशान नहीं करतीं, इसलिए उनके इस व्यवहार को 'शांत स्वभाव' मान लिया जाता है।
'परफेक्ट' दिखने का मुखौटा (Masking)
लड़कियों पर बचपन से ही समाज और परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने और एक 'आदर्श बेटी' बनने का सामाजिक दबाव होता है। इस दबाव के कारण वे अपनी कमियों और मानसिक संघर्ष को छुपाने में माहिर हो जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में 'मास्किंग' (Masking) कहा जाता है। वे खुद को हर काम में परफेक्ट दिखाने के लिए अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा झोंक देती हैं। वे रात-रात भर जागकर पढ़ाई करेंगी या अपनी चीज़ों को सहेजने के लिए अत्यधिक तनाव लेंगी, ताकि कोई उन पर उंगली न उठा सके। उनका यह 'अच्छा व्यवहार' ही उनके डिसऑर्डर का सबसे बड़ा छुपाने वाला कवच बन जाता है।
देर से पहचान होने के गंभीर नुकसान
स्टडी के अनुसार, लक्षणों की अनदेखी का सबसे बुरा असर लड़कियों की मानसिक सेहत पर पड़ता है। लड़कों का डायग्नोसिस (पहचान) बचपन में ही हो जाता है, जबकि लड़कियों का ADHD अक्सर कॉलेज जाने या नौकरी शुरू करने की उम्र तक सामने नहीं आता। इतने लंबे समय तक बिना किसी मदद के अकेले संघर्ष करने के कारण, बड़ी होने पर इन लड़कियों में गंभीर एंग्जायटी (घबराहट), डिप्रेशन (अवसाद) और लो सेल्फ-एस्टीम (आत्म-संदेह) का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। वे खुद को हमेशा दूसरों से कमतर और असफल मानने लगती हैं, जिससे उनका करियर और व्यक्तिगत जीवन दोनों प्रभावित होते हैं।
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