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पायसम: दक्षिण भारत की स्वादिष्ट और ऐतिहासिक Sweet

Harrison
11 Feb 2026 9:30 PM IST
पायसम: दक्षिण भारत की स्वादिष्ट और ऐतिहासिक Sweet
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Lifestyle ,लाइफस्टाइल : भारत में मिठाइयों का विशेष महत्व है। चाहे कोई हार का जश्न हो, शादी का समारोह या कोई पारिवारिक फंक्शन, मिठाइयों के बिना खुशियां अधूरी लगती हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध मिठाई है पायसम, जो दक्षिण भारत में सदियों से लोगों की पसंदीदा रही है। यह स्वाद में बेहद स्वादिष्ट, मलाईदार और मीठी होती है। भारत के अन्य हिस्सों में इसे खीर के नाम से भी जाना जाता है।
पायसम खासतौर पर केरल और तमिलनाडु के घरों में बनाई जाती है। यह पारंपरिक दक्षिण भारतीय व्यंजन है, जिसे आमतौर पर त्योहारों, विशेष अवसरों और धार्मिक अनुष्ठानों में परोसा जाता है। इसकी तैयारी में चावल या दलिया, दूध, चीनी और इलायची जैसी खुशबूदार सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कभी-कभी इसे सूखे मेवों और किशमिश के साथ सजाया जाता है, जिससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है।
पायसम का इतिहास बेहद पुराना है। माना जाता है कि यह प्राचीन समय में मंदिरों में भोग के रूप में परोसा जाता था और फिर भक्तों में बांटा जाता था। इसके जरिए न केवल भगवान की प्रसन्नता व्यक्त की जाती थी, बल्कि इसे सामाजिक रूप से भी बांटा जाता था, जिससे समुदाय में मेलजोल और भाईचारा बढ़ता था।
इतिहासकारों के अनुसार, पायसम का सबसे पहला उल्लेख लगभग 400 ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन ग्रंथों में किया गया था। यह दर्शाता है कि पायसम भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रही है। 12वीं सदी में संस्कृत ग्रंथ ‘मानसोल्लास’ में भी पायसम का जिक्र मिलता है, जिसमें बताया गया है कि इसे राजाओं की शाही दावतों में परोसा जाता था। इसका यह उल्लेख इसे सिर्फ साधारण मिठाई नहीं, बल्कि विशिष्ट अवसरों और शाही समारोहों की प्रतीक मिठाई बनाता है।
पायसम के विभिन्न प्रकार आज भी दक्षिण भारत के घरों और त्योहारों में लोकप्रिय हैं। उदाहरण के लिए, केरल में इसे ‘अरक्कू पायसम’ या ‘सेमिया पायसम’ के रूप में जाना जाता है, जबकि तमिलनाडु में इसे ‘वरुथरम पायसम’ कहा जाता है। हर क्षेत्र में इसके बनाने की विधि थोड़ी अलग हो सकती है, लेकिन स्वाद में मिठास और मलाई का संतुलन सभी में समान रहता है।
इस मिठाई का महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। पायसम भारतीय संस्कृति में भाईचारे, मेहमान नवाजी और धार्मिकता का प्रतीक भी है। शादी, जन्मदिन, मंदिर उत्सव या त्यौहार जैसे विशेष अवसरों पर पायसम को परोसना शुभ माना जाता है। इसके सेवन से समारोह में आनंद और उल्लास का माहौल बनता है।
पायसम बनाने की प्रक्रिया में समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। पहले चावल या सेमिया को अच्छी तरह से पकाया जाता है, फिर उसमें दूध, चीनी और मसालों का मिश्रण डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। अंत में सूखे मेवे और किशमिश मिलाई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में मिठाई की मलाईदार बनावट और मीठास सुनिश्चित की जाती है।
आज के समय में पायसम सिर्फ घरों में ही नहीं, बल्कि रेस्त्रां और मिठाई की दुकानों में भी उपलब्ध है। आधुनिक व्यंजन शैली में इसे नए फ्लेवर और सजावट के साथ पेश किया जाता है, लेकिन पारंपरिक स्वाद और बनावट को बनाए रखना इसकी खासियत है।
इस प्रकार, पायसम केवल एक मिठाई नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है। इसके माध्यम से धार्मिक आस्था, पारिवारिक प्रेम और सामाजिक मेलजोल का संदेश मिलता है। पायसम का सेवन न केवल स्वाद का अनुभव कराता है, बल्कि हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ता है।
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