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हर 18 बच्चों में एक थैलेसीमिया कैरियर, कैसे फैलती है बीमारी?

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में थैलेसीमिया एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर सामने आ रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अध्ययन के अनुसार दिल्ली में जन्म लेने वाले हर 18 बच्चों में से एक बच्चा थैलेसीमिया का कैरियर होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी आनुवंशिक होने के कारण माता-पिता से बच्चों तक पहुंचती है और समय रहते जांच व जागरूकता के जरिए इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को जीवनभर नियमित उपचार की जरूरत होती है। ऐसे मरीजों के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण सामान्य तरीके से नहीं हो पाता, जिसके कारण उन्हें बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है।
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के थैलेसीमिया नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार, राजधानी में हर साल करीब 200 थैलेसीमिया मेजर बच्चों का जन्म होता है। इन मरीजों को औसतन हर दो से चार सप्ताह में रक्त चढ़ाना पड़ता है। एक मरीज को सालभर में करीब 30 यूनिट तक रक्त की आवश्यकता हो सकती है।
थैलेसीमिया मरीजों के इलाज में केवल रक्त चढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता। बार-बार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ने लगती है, जिससे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शरीर में जमा अतिरिक्त आयरन को नियंत्रित करने के लिए मरीजों को आयरन चेलेशन दवाएं दी जाती हैं। अगर इन दवाओं का नियमित सेवन न किया जाए तो हृदय, लीवर और हार्मोन से जुड़े अंगों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
मरीजों और उनके परिवारों के लिए सबसे बड़ी चिंता रक्त और जरूरी दवाओं की उपलब्धता बनी हुई है। दिल्ली के अस्पतालों में समय-समय पर आयरन चेलेशन दवा ‘डेसफेरल’ की कमी की समस्या सामने आती रही है। दवाओं की कमी और रक्त उपलब्धता में परेशानी के कारण मरीजों के इलाज में बाधा आती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि थैलेसीमिया से बचाव के लिए विवाह से पहले जांच और गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है। अगर पति-पत्नी दोनों थैलेसीमिया कैरियर हैं तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए समय पर जांच कर बीमारी के जोखिम को कम किया जा सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित रक्तदान भी थैलेसीमिया मरीजों के जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्याप्त मात्रा में रक्त उपलब्ध होने से मरीजों को समय पर उपचार मिल सकता है और उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
दिल्ली में थैलेसीमिया मरीजों के इलाज के लिए कई बड़े सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं उपलब्ध हैं। एम्स, सफदरजंग अस्पताल, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, गुरु तेग बहादुर अस्पताल, लोकनायक अस्पताल और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय जैसे संस्थानों में मरीजों को रक्त चढ़ाने, जांच और आयरन चेलेशन थेरेपी की सुविधा दी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि थैलेसीमिया को नियंत्रित करने के लिए केवल इलाज ही नहीं बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना भी जरूरी है। लोगों को बीमारी के कारण, जांच और बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। विवाह पूर्व जांच और समय पर चिकित्सकीय सलाह से थैलेसीमिया के नए मामलों को कम किया जा सकता है।
राजधानी में बढ़ते थैलेसीमिया मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और विशेषज्ञ लगातार जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि जांच, नियमित रक्तदान और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करके इस आनुवंशिक बीमारी से प्रभावित लोगों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है।





