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न डायलॉग न गाना फिर भी भाव व्यक्त करता है झारखंड का छऊ नृत्य

nidhi
21 Aug 2026 1:25 PM IST
न डायलॉग न गाना फिर भी भाव व्यक्त करता है झारखंड का छऊ नृत्य
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छऊ डांस की अनोखी कहानी जानकर गर्व करेंगे झारखंड की इस कला पर
भारत की लोक संस्कृति अपनी विविधता और परंपराओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे लोक नृत्य हैं, जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि इतिहास, परंपरा और समाज की कहानियों को भी जीवित रखते हैं। इन्हीं में से एक है झारखंड का प्रसिद्ध ‘छऊ डांस’। खास बात यह है कि इस नृत्य में न तो कोई संवाद होता है और न ही कहानी सुनाने के लिए गाने का सहारा लिया जाता है, फिर भी कलाकार अपनी भाव-भंगिमाओं और शानदार नृत्य शैली से पूरी कहानी दर्शकों के सामने पेश कर देते हैं।
छऊ नृत्य मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। झारखंड में इसे विशेष रूप से सरायकेला क्षेत्र की पहचान माना जाता है। यह लोक नृत्य अपनी वीरता, युद्ध कला और पौराणिक कथाओं के प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। छऊ शब्द की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, लेकिन कई जानकार इसे छाया, मुखौटे और अभिनय से जोड़कर देखते हैं।
इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत इसके कलाकारों की शारीरिक कला है। छऊ नर्तक अपने शरीर के हाव-भाव, तेज गति वाले कदमों और युद्ध जैसी मुद्राओं के माध्यम से कहानी को जीवंत बनाते हैं। इसमें चेहरे के भावों की जगह शरीर की गतिविधियों का अधिक महत्व होता है। यही कारण है कि कलाकारों को लंबे समय तक कठिन अभ्यास करना पड़ता है।
छऊ डांस का संबंध प्राचीन युद्ध परंपराओं से भी माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, पहले यह नृत्य योद्धाओं के प्रशिक्षण और युद्ध कौशल को प्रदर्शित करने का माध्यम था। इसमें तलवार, ढाल और अन्य हथियारों की मुद्राओं जैसी गतिविधियां दिखाई जाती हैं। समय के साथ यह कला धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बन गई।
इस नृत्य में रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं के प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है। कलाकार अलग-अलग पात्रों की वेशभूषा और मुखौटे पहनकर मंच पर उतरते हैं। राक्षस, देवी-देवता, योद्धा और अन्य किरदारों को बेहद आकर्षक तरीके से पेश किया जाता है।
सरायकेला छऊ की पहचान इसके खूबसूरत मुखौटों से भी होती है। कलाकार रंग-बिरंगे और कलात्मक मुखौटे पहनते हैं, जो पात्रों की पहचान बताते हैं। इन मुखौटों को तैयार करने में स्थानीय कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हर मुखौटे के पीछे एक अलग कहानी और कला की परंपरा छिपी होती है।
छऊ नृत्य में संगीत का भी विशेष महत्व है। हालांकि इसमें गीत या संवाद नहीं होते, लेकिन ढोल, नगाड़े और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। संगीत की गति के साथ नर्तकों की चाल और ऊर्जा बदलती रहती है, जिससे दर्शकों को कहानी समझने में आसानी होती है।
आज छऊ नृत्य केवल झारखंड या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पहचान मिली है। वर्ष 2010 में यूनेस्को ने छऊ नृत्य को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया था। इससे इस कला को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली।
आधुनिक दौर में भी कई कलाकार छऊ नृत्य की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। हालांकि बदलते समय और आधुनिक मनोरंजन के साधनों के कारण लोक कलाओं के सामने चुनौतियां भी हैं, लेकिन छऊ डांस आज भी अपनी अनोखी शैली और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित करता है।
झारखंड का छऊ डांस यह साबित करता है कि कहानी कहने के लिए हमेशा शब्दों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी शरीर की भाषा, कला और परंपरा मिलकर ऐसा प्रभाव पैदा करती है, जो बिना बोले भी दिल तक पहुंच जाती है।
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