लाइफ स्टाइल

स्त्री वेश में पुरुष कलाकार, जानिए इस लोक परंपरा की खासियत

nidhi
24 Oct 2026 8:51 AM IST
स्त्री वेश में पुरुष कलाकार, जानिए इस लोक परंपरा की खासियत
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लाइफस्टाइल : बिहार की सांस्कृतिक पहचान में लोकगीतों, लोकनृत्यों और ग्रामीण रंगमंच का खास स्थान है। शादी-ब्याह और उत्सवों में होने वाले नाच के पीछे मनोरंजन के साथ एक समृद्ध कलात्मक परंपरा भी रही है। इसी से जुड़ा है बोलचाल में ‘नचनिया’ कहा जाने वाला नाच। इसके संदर्भ में अक्सर उस लोक प्रदर्शन परंपरा की चर्चा होती है, जिसमें पुरुष कलाकार स्त्री वेश धारण करके नृत्य, गायन और अभिनय करते हैं। भोजपुरी अंचल में प्रचलित ‘लौंडा नाच’ इसका प्रमुख उदाहरण है। हालांकि, ‘नचनिया’ कोई एक निश्चित शास्त्रीय नृत्य शैली का औपचारिक नाम नहीं है।

आम लोगों तक कैसे पहुंची नाच की महफिल?
इस परंपरा के विकास को समझने के लिए पुराने ग्रामीण समाज की परिस्थितियों को देखना जरूरी है। महंगी नृत्य महफिलों तक आम लोगों की पहुंच सीमित थी। संपन्न परिवार कलाकारों को बुला सकते थे, लेकिन गरीब और वंचित समुदायों के लिए ऐसे आयोजन आसान नहीं थे। लोककलाओं के अध्येताओं के अनुसार, इसी सामाजिक पृष्ठभूमि में पुरुष कलाकारों के स्त्री वेश में प्रस्तुति देने वाली मंडलियों ने अपनी जगह बनाई। उन्होंने मनोरंजन को गांवों और आम लोगों के बीच पहुंचाया। हालांकि, इसकी शुरुआत को किसी एक तारीख या घटना से जोड़ना उचित नहीं होगा।
धीरे-धीरे ऐसी प्रस्तुतियां विवाह समारोहों और सामुदायिक आयोजनों का हिस्सा बन गईं। स्थानीय बोली में गीत, परिचित परिस्थितियों पर संवाद और हास्य दर्शकों को इनसे जोड़ते थे। मंच पर दिखाई देने वाले पात्र लोगों को अपने आसपास के जीवन जैसे लगते थे। कलाकारों और दर्शकों के बीच यही निकटता इस लोक परंपरा की बड़ी ताकत बनी। इसमें प्रस्तुति की सफलता केवल नृत्य पर निर्भर नहीं थी; कहानी कहने और दर्शकों का ध्यान बनाए रखने की क्षमता भी मायने रखती थी।
साज-सज्जा के साथ अभिनय का हुनर
इस नाच की खासियत कलाकारों की वेशभूषा और भाव-अभिव्यक्ति में दिखाई देती है। पुरुष कलाकार स्त्री पात्र निभाने के लिए साड़ी, आभूषण और श्रृंगार का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन किसी पात्र को प्रभावी बनाने के लिए पहनावा पर्याप्त नहीं होता। चेहरे के भाव, आवाज, चाल और संवाद की अदायगी भी महत्वपूर्ण होती है। ढोलक और हारमोनियम जैसे वाद्य प्रस्तुति को संगीत देते हैं। नृत्य के बीच हास्य और संवाद आने से कार्यक्रम में नाटकीयता बनी रहती है। यही कारण है कि इसे केवल नाच कहकर समझना अधूरा होगा।
भिखारी ठाकुर ने दिया सामाजिक सरोकार
भोजपुरी लोक रंगमंच की चर्चा भिखारी ठाकुर के योगदान के बिना अधूरी है। उन्होंने गीत, संगीत और अभिनय के माध्यम से आम लोगों की समस्याओं को मंच पर स्थान दिया। उनकी रचनाओं ने ग्रामीण जीवन के अनुभवों को ऐसी भाषा में प्रस्तुत किया, जिसे दर्शक आसानी से समझ सकें। बिहार की कला शिक्षा सामग्री में भी उन्हें भोजपुरी भाषा और संस्कृति के महत्वपूर्ण नाटककारों तथा कलाकारों में शामिल किया गया है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘बिदेसिया’ और ‘बेटी-बेचवा’ का उल्लेख मिलता है।
‘बिदेसिया’ जैसी रचनाओं में रोजी-रोटी के लिए घर से दूर जाने और पीछे रह गए परिवार की पीड़ा सामने आती है। वहीं, ‘बेटी-बेचवा’ विवाह से जुड़ी सामाजिक कुरीतियों पर सवाल उठाती है। इन विषयों ने लोकमंच को सामाजिक संवाद का माध्यम बनाया। दर्शक प्रस्तुति में मनोरंजन के साथ अपने जीवन की मुश्किलों को भी पहचान सकते थे। भिखारी ठाकुर का महत्व इस परंपरा को प्रभावशाली कथाओं और सामाजिक सवालों से समृद्ध करने में है।
लोक कलाकारों को सम्मान देने की जरूरत
इस कला से जुड़े कलाकारों को लोकप्रियता के बावजूद उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्त्री पात्र निभाने वाले पुरुषों का मजाक उड़ाना और उनके पेशे को कमतर समझना ऐसी समस्याएं रही हैं। लोककलाओं पर हुए विमर्श बताते हैं कि जातिगत तथा सामाजिक पूर्वाग्रहों ने भी कलाकारों की प्रतिष्ठा प्रभावित की। इसलिए किसी कलाकार को अपमानित करने के लिए ‘नचनिया’ शब्द इस्तेमाल करना उसकी मेहनत और कलात्मक पहचान को चोट पहुंचाता है।
इस विरासत को समझने के लिए उसकी कहानियों, संगीत और अभिनय पर ध्यान देना जरूरी है। कलाकारों की प्रस्तुतियों का दस्तावेजीकरण, प्रशिक्षण और सम्मानजनक मंच इसके संरक्षण में उपयोगी हो सकते हैं। नई पीढ़ी को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि ग्रामीण नाच की परंपराओं में मनोरंजन के साथ समाज के अनुभव भी दर्ज हैं। कलाकारों को उनके हुनर के आधार पर पहचान देना इस सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सम्मान व्यक्त करने का जरूरी तरीका है।

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