लाइफ स्टाइल

आटा है, अनाज नहीं! जानें कुट्टू का राज

Ashish verma
10 Oct 2026 8:08 PM IST
आटा है, अनाज नहीं! जानें कुट्टू का राज
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लाइफ स्टाइल : नवरात्र में व्रत रखने वाले लोगों की थाली में कुट्टू के आटे से बने व्यंजन अक्सर दिखाई देते हैं। कहीं इसकी पूरी बनाई जाती है, तो कहीं रोटी और पकौड़े तैयार किए जाते हैं। सामान्य दिनों में गेहूं का आटा इस्तेमाल करने वाले कई परिवार व्रत के दौरान कुट्टू अपनाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब दोनों से आटा बनता है, तो गेहूं से परहेज और कुट्टू खाने की परंपरा क्यों है? इसका जवाब कुट्टू की वनस्पतिक पहचान और व्रत की खानपान संबंधी परंपराओं में मिलता है।
कुट्टू को अंग्रेजी में ‘बकव्हीट’ कहा जाता है। नाम में ‘व्हीट’ होने के बावजूद यह गेहूं नहीं है। इसे वनस्पति विज्ञान में वास्तविक अनाज की जगह ‘छद्म अनाज’ यानी स्यूडोसीरियल माना जाता है। इसका अर्थ है कि इसका इस्तेमाल अनाज की तरह होता है, लेकिन यह वास्तविक अनाज वाले पौधों की श्रेणी में नहीं आता। इसके दानों का बाहरी छिलका हटाने के बाद अंदर के हिस्से को पीसकर आटा बनाया जाता है। इसी कारण रसोई में इसका उपयोग परिचित आटे जैसा लगता है।
गेहूं, चावल और मक्का जैसे वास्तविक अनाज घास कुल के पौधों से प्राप्त होते हैं। कुट्टू की पहचान इससे अलग है। यह पॉलीगोनेसी कुल का पौधा है। इसके खाने योग्य बीजों को भोजन में इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए केवल दाने जैसा दिखाई देने या पीसकर आटा बन जाने से इसे गेहूं के बराबर वनस्पतिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यहां ‘अनाज’ का वैज्ञानिक वर्गीकरण और रोजमर्रा की भाषा में उसका इस्तेमाल अलग-अलग अर्थ रखते हैं।
‘आटा’ शब्द भी किसी एक फसल की पहचान नहीं है। यह मुख्य रूप से पीसकर तैयार किए गए खाद्य पदार्थ के रूप को बताता है। गेहूं पीसने से गेहूं का आटा बनता है, जबकि कुट्टू के दाने पीसने से कुट्टू का आटा मिलता है। दोनों का इस्तेमाल व्यंजन बनाने में हो सकता है, लेकिन उनके मूल पौधे अलग हैं। कुट्टू के बारे में होने वाला भ्रम अक्सर इसी बात से शुरू होता है कि लोग आटा और अनाज को एक ही अर्थ में समझ लेते हैं।
नवरात्र के उपवास में कई परिवार सामान्य अनाज और रोजमर्रा के कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करते हैं। ऐसी परंपराओं में कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा जैसे विकल्पों को स्थान मिलता है। कुट्टू को व्रत में स्वीकार किए जाने को उसकी सामान्य अनाज से अलग पहचान के साथ समझा जाता है। हालांकि, धार्मिक भोजन संबंधी नियम केवल वैज्ञानिक वर्गीकरण से तय नहीं होते। परिवार, क्षेत्र और पालन की जाने वाली परंपरा भी यह निर्धारित करती है कि व्रत में क्या खाया जाएगा।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि किसी खाद्य पदार्थ का छद्म अनाज होना अपने आप उसे हर व्रत में स्वीकार्य बना देता है। कुछ लोग नवरात्र में फल और दूध तक सीमित रहते हैं, जबकि कुछ परिवार निर्धारित व्रत सामग्री से भोजन बनाते हैं। कुट्टू की लोकप्रियता उन परंपराओं में अधिक दिखाई देती है, जहां उसके आटे से बने व्यंजन स्वीकार किए जाते हैं। व्रत की थाली में उसकी जगह समझने के लिए स्थानीय और पारिवारिक रीति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
कुट्टू के इस्तेमाल का एक व्यावहारिक पक्ष इसकी बहुपयोगिता है। इसके आटे से रोटी, पूरी और पकौड़े जैसे परिचित व्यंजन बनाए जाते हैं। इससे सामान्य भोजन से अलग सामग्री इस्तेमाल करते हुए भी लोगों को खाने के जाने-पहचाने विकल्प मिल जाते हैं। नवरात्र में कुट्टू के इन व्यंजनों का प्रचलन दर्ज है। हालांकि, यह कब और किस स्थान पर पहली बार व्रत का हिस्सा बना, इसके लिए किसी एक निश्चित घटना या तारीख का दावा करना उचित नहीं होगा।
इसकी लोकप्रियता को केवल धार्मिक उपयोग तक सीमित समझना भी अधूरा होगा। कुट्टू का इस्तेमाल भारत के बाहर भी भोजन बनाने में होता है। इसके दानों और आटे से अलग-अलग प्रकार के खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। जापान में सोबा नूडल्स बनाने में भी कुट्टू का उपयोग होता है, हालांकि उनमें गेहूं का आटा मिलाया जा सकता है। इससे पता चलता है कि कुट्टू अपने आप में एक खाद्य फसल है; भारत में व्रत के भोजन से उसका जुड़ाव उसका एक विशेष सांस्कृतिक उपयोग है।
कुट्टू की एक और विशेषता यह है कि शुद्ध कुट्टू प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन रहित होता है। लेकिन बाजार में मिलने वाला प्रत्येक मिश्रित आटा या उससे तैयार उत्पाद केवल कुट्टू से बना हो, यह जरूरी नहीं है। किसी उत्पाद में गेहूं या दूसरा आटा मिलाया गया हो सकता है। इसलिए सामग्री की सूची देखना उपयोगी है। ग्लूटेन रहित होने की विशेषता और व्रत में स्वीकार्यता दो अलग बातें हैं; धार्मिक नियमों में किसी सामग्री की अनुमति उसकी परंपरागत स्वीकृति पर निर्भर करती है।
कुट्टू की कहानी में भोजन और परंपरा का संबंध साफ दिखाई देता है। वैज्ञानिक रूप से यह वास्तविक अनाज से अलग छद्म अनाज है, जबकि रसोई में इसके दाने आटे और व्यंजनों के रूप में इस्तेमाल होते हैं। नवरात्र के कई उपवासों में सामान्य अनाज से परहेज के बीच इसे स्वीकार्य विकल्प का स्थान मिला है। इस तरह इसकी अलग वनस्पतिक पहचान, खाना बनाने में उपयोगिता और पारिवारिक खानपान की परंपराएं मिलकर व्रत की थाली में इसकी महत्वपूर्ण जगह को समझाती हैं।
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