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‘कुएं में कूद मर जाऊंगी...’, आखिर ससुराल जाने से क्यों डर रही दुल्हन?

nidhi
29 Sept 2026 1:33 PM IST
‘कुएं में कूद मर जाऊंगी...’, आखिर ससुराल जाने से क्यों डर रही दुल्हन?
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ससुराल जाने से किया इनकार
हरियाणवी लोकगीत अपनी देसी भाषा, मजेदार संवाद और जीवन से जुड़े किस्सों के लिए खास पहचान रखते हैं। ऐसे ही एक ठेठ हरियाणवी लोकगीत में दुल्हन ससुराल जाने से साफ इनकार करती नजर आती है और मजाकिया अंदाज में कहती है कि वह कुएं में कूदकर मर जाना पसंद करेगी, लेकिन ससुराल नहीं जाएगी। पहली नजर में यह पंक्ति बेहद नाटकीय लगती है, लेकिन गीत की पूरी कहानी सुनने पर इसके पीछे छिपा हास्य और पारिवारिक तकरार सामने आती है।
लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें दुल्हन की शिकायतों को बहुत ही चुटीले अंदाज में पेश किया गया है। वह ससुराल के माहौल को लेकर एक के बाद एक कारण गिनाती है और हर कारण में देसी हास्य का रंग दिखाई देता है। कहीं सास को लेकर शिकायत है, कहीं ननद को लेकर ताना और कहीं घर के दूसरे सदस्यों से जुड़ी मजेदार बातें।
हरियाणवी लोकसंगीत में इस तरह के गीत लंबे समय से शादी-ब्याह और पारिवारिक समारोहों का हिस्सा रहे हैं। इनमें बहू-सास, ननद-भाभी और पति-पत्नी के रिश्तों को कभी मजाक तो कभी तंज के जरिए पेश किया जाता है। यही वजह है कि ऐसे गीत सुनते ही गांव-देहात के लोग उनसे आसानी से जुड़ जाते हैं।
इस गीत में दुल्हन का ससुराल न जाने का फैसला असल में गंभीर सामाजिक विद्रोह के रूप में नहीं, बल्कि हास्य के रूप में पेश किया गया है। वह अपने मायके के आराम और ससुराल की जिम्मेदारियों के बीच तुलना करती है। इसी तुलना से गीत में मजेदार स्थिति बनती जाती है।
हरियाणवी लोकगीतों की भाषा सीधी और बेबाक होती है। उनमें भावनाओं को घुमाकर कहने की बजाय साफ शब्दों में सामने रखा जाता है। इस गीत में भी दुल्हन बिना किसी झिझक के अपनी परेशानी जाहिर करती है। यही बेबाकी इसे सुनने वालों के लिए और ज्यादा दिलचस्प बना देती है।
गीत की लोकप्रियता का एक कारण इसका रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा होना भी है। शादी के बाद नई दुल्हन को नए घर, नए लोगों और नई जिम्मेदारियों के साथ तालमेल बैठाना पड़ता है। इसी अनुभव को लोकगीत में हंसी-मजाक और अतिशयोक्ति के साथ पेश किया गया है।
‘कुएं में कूद मर जाऊंगी’ जैसी पंक्ति भी इसी अतिशयोक्ति का हिस्सा है। लोकगीतों में भावनाओं को असरदार बनाने के लिए ऐसी पंक्तियों का इस्तेमाल आम रहा है। इन्हें शाब्दिक अर्थ में नहीं बल्कि गीत की नाटकीय शैली और हास्य के संदर्भ में समझा जाता है।
दुल्हन के बहाने लोकगीत कई पारिवारिक रिश्तों पर हल्के-फुल्के कटाक्ष भी करता है। सास-बहू के बीच होने वाली नोकझोंक से लेकर पति की भूमिका तक, हर पहलू को मजेदार तरीके से छुआ गया है। यही कारण है कि गीत सिर्फ महिलाओं के बीच ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के बीच मनोरंजन का जरिया बन जाता है।
हरियाणा और आसपास के इलाकों में शादी के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है। इन गीतों में खुशी, विदाई, प्रेम, शिकायत, मजाक और भावुकता सब कुछ एक साथ देखने को मिलता है। कई गीतों में दुल्हन की मनःस्थिति को बेहद हल्के अंदाज में पेश किया जाता है।
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