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भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है हिरनी-बिरनी, जानें दो नटिनों की कहानी

nidhi
6 Oct 2026 11:12 AM IST
भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है हिरनी-बिरनी, जानें दो नटिनों की कहानी
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नट समुदाय से निकली हिरनी-बिरनी की कथा
बिहार का नाम आते ही बहुत से लोगों के दिमाग में भोजपुरी गाने और उनमें दिखने वाला आधुनिक डांस आता है, लेकिन बिहार की पारंपरिक लोक संस्कृति इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। इसी परंपरा का हिस्सा है हिरनी-बिरनी, जो सिर्फ नृत्य नहीं बल्कि गीत, अभिनय और लोककथा का संगम है। यह लोकगाथा मुख्य रूप से बिहार के मगध और अंग क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है।
हिरनी-बिरनी की सबसे खास बात इसकी कहानी है। यह कथा दो नटिन बहनों—हिरनी और बिरनी—के इर्द-गिर्द घूमती है। लोककथा के अनुसार दोनों बहनें बेहद सुंदर और चतुर थीं। उनके पास मोहन नाम का एक शक्तिशाली भैंसा था, जिसे काबू करना बेहद मुश्किल माना जाता था। उन्होंने विवाह के लिए शर्त रखी कि जो व्यक्ति इस भैंसे को नाथ देगा, वे उससे विवाह करेंगी।
कई अखाड़ों के पहलवानों ने इस चुनौती को स्वीकार किया, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। लोकगाथा के अलग-अलग संस्करणों में घटनाओं का क्रम थोड़ा भिन्न मिलता है, लेकिन अंततः वीर पोसन सिंह इस चुनौती को पूरा करता है और मोहन भैंसे को काबू कर लेता है। इसके बाद हिरनी और बिरनी का विवाह उससे होता है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पोसन सिंह ऊंची जाति से जुड़ा बताया जाता है, जबकि हिरनी और बिरनी नट समुदाय से थीं। इसी कारण विवाह के बाद उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। लोकगाथा प्रेम, जातिगत बंधनों, समाज की बंदिशों और पति-पत्नी के रिश्तों के संघर्ष को आगे बढ़ाती है। यही वजह है कि हिरनी-बिरनी सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को दिखाने वाली लोक प्रस्तुति भी है।
इस लोकनृत्य की प्रस्तुति में कहानी को गीत और अभिनय के जरिए आगे बढ़ाया जाता है। कलाकार चेहरे के भाव, हाथ-पैरों की मुद्राओं और संवादात्मक नृत्य के जरिए पात्रों को जीवंत करते हैं। इसमें ढोलक, झाल और मंजीरा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है। गीत अंगिका और स्थानीय बोलियों में गाए जाते हैं।
महिला कलाकार हिरनी और बिरनी की भूमिका में रंग-बिरंगी साड़ी या घाघरा-चोली पहनती हैं, जबकि पुरुष पात्र पारंपरिक धोती-कुर्ता जैसे परिधान में दिखाई देते हैं। पूरी प्रस्तुति में नृत्य के साथ नाटकीयता भी रहती है, इसलिए इसे लोकनृत्य के साथ-साथ लोकनाट्य की शैली में भी देखा जाता है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत संगीत नाटक अकादमी की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में भी “Hirni Birni Lok Gatha” को बिहार की लोकगीत और लोककथा परंपरा के रूप में दर्ज किया गया है। इससे इसकी सांस्कृतिक महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
आज भोजपुरी सिनेमा के ग्लैमरस डांस और लोकनृत्यों को अक्सर एक ही नजर से देखा जाता है, लेकिन हिरनी-बिरनी इससे बिल्कुल अलग परंपरा है। इसकी असली पहचान इसकी कथा, लोकसंगीत, अभिनय और सामाजिक संदेश में है। यह बिहार की उस संस्कृति को सामने लाती है जो गांवों की मौखिक परंपरा के जरिए पीढ़ियों से आगे बढ़ती रही है।
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