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हर देखने वाले को भावुक कर देती है हातिमा गुड़िया

Kanchan Paikara
4 July 2026 7:46 PM IST
हर देखने वाले को भावुक कर देती है हातिमा गुड़िया
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Lifestyle लाइफ स्टाइल : बचपन में हर किसी ने गुड्डे-गुड़ियों से खेला होगा, लेकिन असम की ‘हातिमा गुड़िया’ सिर्फ एक खिलौना नहीं बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह गुड़िया असमिया परंपरा और लोककला का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, जिसे देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में एक खास पहचान मिली हुई है।
हातिमा गुड़िया का संबंध असम के धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव की प्रसिद्ध टेराकोटा शिल्प परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह गांव ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदी गदाधर के किनारे बसा हुआ है। यहां के कारीगर पीढ़ियों से मिट्टी से बनी कलाकृतियों को आकार देते आ रहे हैं, जिनमें हातिमा गुड़िया विशेष रूप से लोकप्रिय है।
इस गुड़िया को केवल सजावट या खेल की वस्तु नहीं माना जाता, बल्कि यह असम की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कला का जीवंत उदाहरण है। इसमें स्थानीय जीवन, परंपराओं और भावनाओं की झलक देखने को मिलती है, जो इसे और भी खास बनाती है।
अशारीकांडी गांव के नाम को लेकर भी एक दिलचस्प लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि यह नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—‘असार’ और ‘कांडी’। असार को असमिया कैलेंडर का तीसरा महीना माना जाता है, जबकि कांडी का अर्थ रोना होता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, असार महीने में यहां भारी बारिश होती थी, जिसके कारण इस क्षेत्र को यह नाम मिला।
इसी प्राकृतिक परिवेश और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने इस गांव की कला और परंपराओं को आकार दिया है। टेराकोटा शिल्प में यहां के कारीगर मिट्टी से ऐसी आकृतियां बनाते हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं। हातिमा गुड़िया इनमें सबसे खास मानी जाती है क्योंकि इसमें भावनात्मक जुड़ाव और सांस्कृतिक गहराई दोनों देखने को मिलते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी पारंपरिक कलाएं न केवल स्थानीय कारीगरों की आजीविका का साधन हैं, बल्कि यह भारत की विविध सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करती हैं। हातिमा गुड़िया जैसी कलाकृतियां आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं।
आज के समय में जब आधुनिक खिलौनों का चलन बढ़ गया है, तब भी हातिमा गुड़िया जैसी पारंपरिक वस्तुएं अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। यह न केवल कला का नमूना है, बल्कि भावनाओं और संस्कृति का भी प्रतीक है।
असम की यह अनोखी परंपरा इस बात का उदाहरण है कि कैसे लोककला और संस्कृति समय के साथ भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकती हैं और लोगों के दिलों को छू सकती हैं।
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