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गुजरात का अनोखा लोक नृत्य टिप्पणी, कोली समुदाय से जुड़ी है इसकी कहानी
nidhi
9 Oct 2026 9:09 AM IST

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गुजरात की पहचान की बात होती है तो सबसे पहले गरबा और डांडिया का नाम सामने आता है। नवरात्रि के दौरान रंग-बिरंगे परिधानों में थिरकते लोग और तालियों की गूंज इस राज्य की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं। लेकिन गुजरात की लोक संस्कृति में एक और अनोखा नृत्य शामिल है, जिसे ‘टिप्पणी’ कहा जाता है। सौराष्ट्र क्षेत्र से जुड़ा यह लोक नृत्य अपनी खास शैली और मेहनतकश महिलाओं के इतिहास के लिए जाना जाता है। इसकी परंपरा का संबंध कोली समुदाय की महिलाओं और निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले एक पारंपरिक औजार से रहा है।
काम के दौरान शुरू हुई नृत्य की परंपरा
टिप्पणी लोक नृत्य की जड़ें गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में मानी जाती हैं। वेरावल और चोरवाड़ के आसपास के इलाकों में इस नृत्य की परंपरा विकसित हुई। पुराने समय में घरों के फर्श और नींव को मजबूत करने के लिए चूने को दबाने और जमीन को समतल करने का काम किया जाता था। इस काम में लंबी लकड़ी की छड़ियों का इस्तेमाल होता था, जिनके निचले हिस्से में लकड़ी या लोहे का भारी टुकड़ा लगा होता था।
निर्माण कार्य करने वाली महिलाएं इन औजारों से जमीन को दबाते समय लयबद्ध तरीके से काम करती थीं। काम की एकरसता और थकान को कम करने के लिए गीतों तथा सामूहिक ताल का सहारा लिया जाता था। समय के साथ यही लयबद्ध गतिविधि नृत्य का रूप लेने लगी। इस तरह टिप्पणी लोक नृत्य स्थानीय श्रम संस्कृति और सामूहिक जीवन से जुड़ गया।
कोली समुदाय की महिलाओं से जुड़ा इतिहास
टिप्पणी नृत्य का संबंध विशेष रूप से कोली समुदाय की मेहनतकश महिलाओं से बताया जाता है। हालांकि, सौराष्ट्र की इस परंपरा में अन्य समुदायों की महिलाओं की भागीदारी का भी उल्लेख मिलता है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की सांस्कृतिक विविधता से संबंधित पुस्तक में सौराष्ट्र की टिप्पणी नृत्य परंपरा के साथ कडिया, कुंभार, उभड़, भील, खारवा और सिद्दी समुदायों की महिलाओं का भी जिक्र किया गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि टिप्पणी केवल एक मनोरंजन गतिविधि नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समाज, पारंपरिक कामकाज और सामुदायिक सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी लोककला है। इस नृत्य में महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और एक साथ तालमेल बनाकर प्रस्तुति देना इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।
लंबी छड़ियों से बनती है खास लय
टिप्पणी नृत्य में इस्तेमाल होने वाले औजार को भी टिप्पणी कहा जाता है। यह सामान्य छड़ी से अलग होता है। इसकी लंबाई लगभग 175 सेंटीमीटर बताई जाती है और निचले सिरे पर चौकोर लकड़ी या लोहे का भारी हिस्सा लगा होता है। पारंपरिक तौर पर इसका उपयोग फर्श या जमीन को दबाने के लिए किया जाता था।
नृत्य के दौरान महिलाएं अक्सर दो आमने-सामने की कतारों में खड़ी होती हैं। वे संगीत और गीतों की ताल के साथ अपनी छड़ियों को जमीन पर पटकती हैं। छड़ियों के जमीन से टकराने की आवाज नृत्य को एक विशिष्ट लय देती है। ढोल, मंजीरा, झांझ और शहनाई जैसे वाद्य यंत्र इस प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाते हैं। तेज कदमों और छड़ियों के समन्वित इस्तेमाल से यह नृत्य गरबा और डांडिया से अलग पहचान बनाता है।
गरबा से अलग है टिप्पणी की पहचान
गरबा में आमतौर पर गोल घेरे में घूमते हुए ताली बजाकर या अन्य पारंपरिक तरीकों से नृत्य किया जाता है। डांडिया में प्रतिभागी लकड़ियों को आपस में टकराकर ताल बनाते हैं। इसके विपरीत, टिप्पणी नृत्य में जमीन पर छड़ियां पटकने की शैली खास महत्व रखती है। इसके पीछे श्रम और निर्माण कार्य से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा रही है।
यही कारण है कि टिप्पणी को केवल एक नृत्य शैली के रूप में नहीं, बल्कि गुजरात के मेहनतकश समुदायों के जीवन और उनकी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के तौर पर भी देखा जाता है। इस लोककला में सामूहिकता, तालमेल और पारंपरिक औजारों का कलात्मक इस्तेमाल एक साथ दिखाई देता है।
त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में भी होती है प्रस्तुति
समय के साथ टिप्पणी नृत्य अपने पारंपरिक कार्यस्थल से निकलकर सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बना। आज इसका प्रदर्शन त्योहारों, विवाह समारोहों और अन्य सामाजिक अवसरों पर भी किया जाता है। पारंपरिक परिधान, लोकगीत और लयबद्ध कदम इस प्रस्तुति को विशिष्ट बनाते हैं। गुजरात की लोक संस्कृति में गरबा और डांडिया की लोकप्रियता के बीच टिप्पणी नृत्य इस बात का उदाहरण है कि रोजमर्रा के श्रम से जुड़ी परंपराएं भी कला का रूप ले सकती हैं। कोली समुदाय की महिलाओं से जुड़ी इसकी विरासत और जमीन पर छड़ियां पटककर ताल बनाने की अनोखी शैली इसे गुजरात की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।
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