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राजपूतों की शान से महिलाओं के श्रृंगार तक जानें लहरिया का अनोखा सफर

nidhi
10 Sept 2026 1:09 PM IST
राजपूतों की शान से महिलाओं के श्रृंगार तक जानें लहरिया का अनोखा सफर
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ल्यादो रे बादीला ढोला’ आखिर कैसे खास बना लहरिया जानें
लाइफस्टाइल डेस्क: राजस्थान की पहचान सिर्फ किले, महल और रेगिस्तान तक सीमित नहीं है। यहां के रंग-बिरंगे कपड़े और पारंपरिक पहनावे भी पूरी दुनिया में मशहूर हैं। इन्हीं में एक है लहरिया, जिसकी रंगीन तिरछी धारियां देखते ही राजस्थान की संस्कृति की झलक दिखाई देने लगती है। आज लहरिया साड़ी और दुपट्टे महिलाओं की पहली पसंद हैं, लेकिन इसका इतिहास पुरुषों की पोशाक और खासतौर पर राजपूती परंपरा से भी जुड़ा रहा है।
कभी पुरुषों की शान था लहरिया
लहरिया राजस्थान की पारंपरिक टाई-डाई यानी बांधकर रंगाई की तकनीक है। कपड़े को तिरछे मोड़कर और कसकर बांधने के बाद अलग-अलग रंगों में रंगा जाता है। खोलने पर कपड़े पर लहरों जैसी धारियां दिखाई देती हैं और इसी वजह से इसका नाम लहरिया पड़ा। राजस्थान पर्यटन विभाग भी लहरिया को प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक वस्त्र कलाओं में शामिल करता है।
पुराने समय में लहरिया का इस्तेमाल केवल महिलाओं की साड़ी या ओढ़नी तक सीमित नहीं था। पुरुष भी लहरिया की पगड़ी और साफा पहनते थे। राजस्थान में पगड़ी सामाजिक पहचान, सम्मान और प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। अलग-अलग रंग और बांधने की शैलियां क्षेत्र तथा अवसर के अनुसार बदलती थीं।
राजपूती परंपरा से गहरा रिश्ता
लहरिया साफा और पगड़ी को राजपूती पहनावे से भी जोड़ा जाता है। खास मौकों, त्योहारों और उत्सवों में रंगीन साफे पुरुषों के पारंपरिक परिधान का अहम हिस्सा रहे हैं। यही लहरिया समय के साथ महिलाओं की साड़ी, ओढ़नी और दुपट्टों में बेहद लोकप्रिय हो गया।
सावन में बढ़ जाती है लहरिया की मांग
लहरिया का क्रेज खासतौर पर सावन और तीज के दौरान बढ़ जाता है। हरे, गुलाबी, पीले, लाल और बहुरंगी लहरिया परिधान राजस्थान के बाजारों की रौनक बढ़ाते हैं। जयपुर और जोधपुर जैसे शहर आज भी लहरिया वस्त्रों के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं।
लोकगीतों में भी लहरिया की चाहत दिखाई देती है। ‘ल्यादो रे बादीला ढोला...’ जैसी लोकधुनें राजस्थान के रंगीन पहनावे और पारंपरिक जीवन की उसी भावना को सामने लाती हैं।
आज लहरिया फैशन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके पीछे राजस्थान की सदियों पुरानी रंगाई कला, पगड़ी-साफे की परंपरा और सांस्कृतिक विरासत छिपी हुई है।
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