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क्यों बना जन गण मन राष्ट्रगान और वंदे मातरम राष्ट्रगीत जानिए इतिहास
nidhi
15 Aug 2026 11:58 AM IST

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राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सफर दो महान प्रतीकों के पीछे छिपा इतिहास
नई दिल्ली : भारत की आजादी की कहानी केवल आंदोलनों, बलिदानों और संघर्षों से नहीं लिखी गई, बल्कि देशभक्ति से ओतप्रोत गीतों और कविताओं ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें 'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' दो ऐसे अमर प्रतीक हैं, जिन्होंने करोड़ों भारतीयों के मन में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाई। एक को देश का राष्ट्रगान बनाया गया तो दूसरे को राष्ट्रगीत का सम्मान मिला। दोनों की अपनी अलग ऐतिहासिक यात्रा और महत्व है।
'वंदे मातरम' ने जगाई थी आजादी की अलख
'वंदे मातरम' की रचना महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत पहली बार 19वीं सदी में सामने आया और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल हुआ। इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीयों में जोश और एकता की भावना पैदा की।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के दौर में 'वंदे मातरम' एक शक्तिशाली नारे के रूप में उभरा। स्वतंत्रता सेनानी सभाओं और आंदोलनों में इसे गाते थे। अंग्रेजी सरकार को डर था कि यह गीत लोगों में राष्ट्रवादी भावना को मजबूत कर रहा है, इसलिए कई जगहों पर इस पर रोक लगाने की कोशिश भी की गई।
आजादी के आंदोलन में बना जनभावना का प्रतीक
1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के दौरान 'वंदे मातरम' की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। यह गीत केवल एक रचना नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा और संघर्ष का प्रतीक बन गया।
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने भी इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार किया। हालांकि, बाद में राष्ट्र के आधिकारिक प्रतीक के चयन के समय इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याओं को लेकर चर्चा हुई।
'जन गण मन' की शुरुआत कैसे हुई?
'जन गण मन' की रचना रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) ने की थी। इसे पहली बार वर्ष 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया था। यह गीत भारत की विविधता, एकता और अलग-अलग क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधने की भावना को दर्शाता है।
इस गीत में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का वर्णन मिलता है। इसकी यही विशेषता इसे पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले गीत के रूप में उपयुक्त बनाती थी।
संविधान सभा ने क्यों चुना 'जन गण मन'?
आजादी के बाद जब भारत अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन कर रहा था, तब राष्ट्रगान को लेकर संविधान सभा में विचार-विमर्श हुआ। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन गण मन' को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया।
इसके चयन के पीछे मुख्य कारण था कि यह गीत भारत की एकता और विविधता को दर्शाता है। इसमें किसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय के बजाय पूरे भारत की भावना दिखाई देती है।
फिर 'वंदे मातरम' को क्यों मिला राष्ट्रगीत का दर्जा?
'वंदे मातरम' के ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए इसे भी विशेष सम्मान दिया गया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि 'वंदे मातरम', जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उसे 'जन गण मन' के समान सम्मान दिया जाएगा और इसे राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
इस तरह भारत को दो महान राष्ट्रीय प्रतीक मिले। 'जन गण मन' ने राष्ट्र की संवैधानिक पहचान को दर्शाया, जबकि 'वंदे मातरम' ने स्वतंत्रता संग्राम की भावनात्मक विरासत को संभाला।
दोनों में क्या है अंतर?
राष्ट्रगान 'जन गण मन':
रचनाकार: रवींद्रनाथ ठाकुर
दर्जा: भारत का आधिकारिक राष्ट्रगान
अवसर: सरकारी और राष्ट्रीय समारोहों में प्रमुख रूप से गाया जाता है
अवधि: लगभग 52 सेकंड
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम':
रचनाकार: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
दर्जा: भारत का राष्ट्रगीत
महत्व: स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणादायक रचना
दो गीत, एक ही भावना
'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' दोनों भारत की आत्मा को दर्शाते हैं। एक देश की संवैधानिक पहचान का प्रतीक है तो दूसरा आजादी के संघर्ष और देशभक्ति की भावना का।
आज भी जब इन दोनों गीतों की गूंज सुनाई देती है तो करोड़ों भारतीयों के मन में गर्व, सम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावना जाग उठती है।
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