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गरबा की शान चनिया चोली, जानिए इसका पुराना इतिहास

nidhi
5 Oct 2026 8:08 AM IST
गरबा की शान चनिया चोली, जानिए इसका पुराना इतिहास
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नवरात्रि में क्यों खास है चनिया चोली?
अहमदाबाद: नवरात्रि आते ही गुजरात के गरबा मैदान रंग-बिरंगी चनिया चोली से सज जाते हैं। गरबा और डांडिया के दौरान महिलाओं की पारंपरिक पोशाक के रूप में पहचानी जाने वाली चनिया चोली केवल फैशन का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें भारतीय परिधान परंपरा के प्राचीन इतिहास से जुड़ी हैं। हालांकि इसे ठीक-ठीक '2000 साल पुराना गुजराती परिधान' कहना ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं है। इसके प्रमुख हिस्सों, खासकर चोली और तीन हिस्सों वाले स्त्री परिधान के रूप, दो हजार साल से भी पुराने स्रोतों में मिलते हैं।
आज की चनिया चोली मुख्य रूप से तीन हिस्सों से मिलकर बनती है। इसमें नीचे पहना जाने वाला घेरदार चनिया, ऊपरी हिस्से की चोली और साथ में ओढ़नी या दुपट्टा होता है। गुजरात में घाघरा या लहंगे के क्षेत्रीय रूप को चनिया या चनियो कहा जाता है। समय के साथ यही पोशाक गुजरात की लोक संस्कृति और खास तौर पर गरबा से गहराई से जुड़ गई। इसके प्राचीन इतिहास की बात करें तो चोली का विकास पुराने 'स्तनपट्ट' या 'कंचुकी' जैसे परिधानों से जोड़ा जाता है। प्राचीन भारतीय स्त्री परिधान में अंतरीय, उत्तरीय और स्तनपट्ट जैसे तीन हिस्सों का उल्लेख मिलता है। संस्कृत और बौद्ध पाली साहित्य में इस तरह के परिधानों के उल्लेख छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक मिलते हैं। पहली शताब्दी ईस्वी तक मूर्तियों और चित्रों में चोली के विकसित रूप दिखाई देने लगते हैं।
आज गुजरात की चनिया चोली अपनी कढ़ाई, शीशे के काम और रंगों के कारण अलग पहचान रखती है। विशेष रूप से कच्छ और दूसरे क्षेत्रों की पारंपरिक कढ़ाई ने इस पोशाक को विशिष्ट स्वरूप दिया है। इसमें ज्यामितीय आकृतियों, रंगीन धागों और छोटे शीशों का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है।
नवरात्रि में चनिया चोली की बनावट का व्यावहारिक महत्व भी है। गरबा में लगातार घूमने और ताल पर नृत्य करने के कारण इसका घेरदार डिजाइन शरीर को आसानी से गति करने देता है। आधुनिक चनिया चोली में भी सर्कुलर कट और अधिक घेर वाले डिजाइन लोकप्रिय हैं। इसके साथ मिरर वर्क, बांधनी और क्षेत्रीय कढ़ाई इसके गुजराती स्वरूप को और उभारती है।
समय के साथ चनिया चोली के डिजाइन में कई बदलाव आए हैं। पारंपरिक सूती और रेशमी कपड़ों के साथ आज अलग-अलग फैब्रिक इस्तेमाल किए जाते हैं। डिजाइन में आधुनिक ब्लाउज, नए कट और हल्के वर्क को भी जगह मिली है। इसके बावजूद पारंपरिक मिरर वर्क और रंग-बिरंगी कढ़ाई आज भी नवरात्रि के चनिया चोली लुक की प्रमुख पहचान हैं।
चनिया चोली अब गुजरात तक सीमित नहीं है। नवरात्रि के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में महिलाएं इसे पहनती हैं। आधुनिक फैशन ने इसके स्वरूप में बदलाव जरूर किया है, लेकिन इसका संबंध गुजरात की लोक परंपराओं से बना हुआ है। इस तरह नवरात्रि में पहनी जाने वाली चनिया चोली के आधुनिक गुजराती स्वरूप और प्राचीन भारतीय परिधान परंपरा के बीच लंबा ऐतिहासिक संबंध दिखाई देता है। इसका वर्तमान रूप गुजरात की लोक कला, कढ़ाई, रंगों और गरबा संस्कृति के साथ विकसित हुआ है।
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