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बिहार का प्रसिद्ध झिझिया नृत्य, मटके के पीछे छिपी है खास मान्यता

नई दिल्ली। भारत की लोकसंस्कृति अपनी विविधता और परंपराओं के लिए दुनियाभर में जानी जाती है। हर राज्य की अपनी अलग लोककलाएं और मान्यताएं हैं, जो वहां की संस्कृति और आस्था को दर्शाती हैं। बिहार की ऐसी ही एक प्राचीन लोक परंपरा है झिझिया लोकनृत्य, जो खासतौर पर मिथिलांचल क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि लोक आस्था, धार्मिक विश्वास और महिलाओं की भावनाओं से जुड़ी एक परंपरा है।
झिझिया नृत्य मुख्य रूप से नवरात्र के दिनों में किया जाता है। इसमें महिलाएं सिर पर छेद वाला मिट्टी का मटका रखकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं। इस मटके के अंदर जलता हुआ दीपक रखा जाता है, जिसकी रोशनी छेदों से बाहर निकलती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसे बिहार का गरबा भी कहा जाता है, क्योंकि दोनों ही नवरात्र के समय किए जाते हैं और इनमें देवी की आराधना की जाती है।
झिझिया शब्द मैथिली भाषा के शब्द ‘झिझ’ से बना माना जाता है, जिसका अर्थ रोशनी या दीपक से जुड़ा होता है। पुराने समय में मिथिलांचल क्षेत्र में यह मान्यता थी कि नवरात्र के दौरान नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर, टोने-टोटके और काले जादू का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे में महिलाएं अपने परिवार, बच्चों और पूरे गांव की सुरक्षा के लिए देवी भगवती और ब्रह्म बाबा की पूजा करते हुए झिझिया नृत्य करती थीं।
लोक मान्यता के अनुसार, झिझिया में इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का मटका पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। इसके अंदर रखा जलता हुआ दीपक मां भगवती की शक्ति का प्रतीक होता है। ऐसा विश्वास है कि मटके से निकलने वाली रोशनी अंधकार और नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है। इसी आस्था के कारण महिलाएं नवरात्र के दौरान पूरी श्रद्धा के साथ यह नृत्य करती हैं।
झिझिया नृत्य करने का तरीका भी काफी खास होता है। महिलाएं मिट्टी के घड़े में कई छोटे-छोटे छेद करवाती हैं और उसके अंदर तेल का दीपक जलाती हैं। इसके बाद उस मटके को सिर पर रखकर संतुलन बनाते हुए गोलाकार में नृत्य करती हैं। महिलाओं का समूह ढोलक, हार्मोनियम और पारंपरिक गीतों की धुन पर ताल मिलाकर नाचता है। इस दौरान महिलाएं देवी की आराधना और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं।
झिझिया के गीतों में भी धार्मिक भावनाएं जुड़ी होती हैं। इन पारंपरिक गीतों में महिलाएं ब्रह्म बाबा और देवी भगवती से अपने परिवार को बुरी शक्तियों से बचाने की प्रार्थना करती हैं। गीतों के माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं आज भी जीवित हैं। यही वजह है कि झिझिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था की पहचान बन चुका है।
इस लोकनृत्य में महिलाओं का पहनावा भी आकर्षण का केंद्र होता है। झिझिया करने वाली महिलाएं आमतौर पर लाल, पीले और अन्य चमकीले रंगों की पारंपरिक साड़ियां पहनती हैं। मैथिली शैली में साड़ी पहनने के साथ वे मांग टीका, नथ, चूड़ियां, पायल, कमरबंध और अन्य पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। इससे इस लोकनृत्य की सुंदरता और बढ़ जाती है।
समय के साथ आधुनिकता का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन बिहार के कई गांवों में झिझिया की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। खासकर मिथिलांचल के क्षेत्रों में नवरात्र के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से इस नृत्य का आयोजन करती हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करती है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ने का काम भी करती है।
झिझिया बिहार की उस समृद्ध लोकपरंपरा का उदाहरण है, जिसमें कला, संगीत, नृत्य और धार्मिक विश्वास एक साथ दिखाई देते हैं। सिर पर छेद वाला मटका लेकर किया जाने वाला यह अनोखा नृत्य आज भी देवी भगवती की शक्ति और लोक आस्था का प्रतीक बना हुआ है।





