लाइफ स्टाइल

राजस्थान का अनोखा लोकनृत्य, सिर्फ पुरुष करते हैं प्रदर्शन

Saba Naaz
27 July 2026 2:58 PM IST
राजस्थान का अनोखा लोकनृत्य, सिर्फ पुरुष करते हैं प्रदर्शन
x

लाइफ स्टाइल: राजस्थान अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और कलाओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां के हर क्षेत्र में अलग-अलग लोकगीत और नृत्य देखने को मिलते हैं, जो वहां के इतिहास, जीवनशैली और सामाजिक परंपराओं को दर्शाते हैं। इन्हीं खास लोक कलाओं में शामिल है राजस्थान का प्रसिद्ध गेर या घेर नृत्य। यह नृत्य मेवाड़, मारवाड़ और बाड़मेर क्षेत्रों में विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे केवल पुरुष ही करते हैं और यह नृत्य गोल घेरे में घूमते हुए किया जाता है।

गेर नृत्य का नाम 'घेर' शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है गोल घेरा। इस नृत्य में कलाकार एक समूह बनाकर गोल घेरे में घूमते हैं और ढोल की थाप पर ताल मिलाते हुए प्रदर्शन करते हैं। इसी गोलाकार शैली के कारण इसे गेर या घेर नृत्य कहा जाने लगा। यह राजस्थान की प्राचीन लोक परंपराओं में से एक है, जिसकी जड़ें कई सदियों पुरानी मानी जाती हैं।

इतिहासकारों और लोक कलाकारों के अनुसार, गेर नृत्य की शुरुआत मेवाड़ और बाड़मेर क्षेत्रों में रहने वाली भील जनजाति से हुई थी। भील समुदाय अपनी वीरता, युद्ध कला और सामूहिक उत्सवों के लिए जाना जाता है। पुराने समय में भील योद्धा लाठी और तलवार चलाने का अभ्यास गोल घेरे में करते थे। धीरे-धीरे यह युद्ध अभ्यास मनोरंजन और उत्सव का हिस्सा बन गया और बाद में लोक नृत्य के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

कुछ लोक मान्यताओं के अनुसार, मारवाड़ क्षेत्र में होली के समय महिलाएं लूर नृत्य करती थीं। उस दौरान पुरुष उनकी सुरक्षा के लिए चारों ओर घेरा बनाकर खड़े रहते थे। समय के साथ पुरुषों ने इसी घेरे में नृत्य करना शुरू किया और धीरे-धीरे गेर नृत्य की परंपरा विकसित हुई। बाद में राजपूत, जांगिड़ और अन्य समुदायों ने भी इसे अपनाया और यह पूरे राजस्थान की पहचान बन गया।

गेर नृत्य का आयोजन मुख्य रूप से होली के त्योहार के आसपास किया जाता है। फाल्गुन महीने में होली के अगले दिन से शुरू होने वाला यह नृत्य कई स्थानों पर लगभग 15 दिनों तक चलता है। इस दौरान गांवों और कस्बों में पुरुष समूह बनाकर एकत्र होते हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर गेर नृत्य करते हैं। इसे केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है।

इस नृत्य में सभी समुदायों के लोग मिलकर हिस्सा लेते हैं। कलाकार एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाते हुए गोल घेरे में घूमते हैं। ढोलक, नगाड़े और बांकिया जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज से पूरा वातावरण उत्साह और ऊर्जा से भर जाता है।

गेर नृत्य की पोशाक भी इसकी खास पहचान है। इसमें पुरुष कलाकार पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा पहनते हैं। वे ऊपर घेरदार अंगरखा और नीचे सफेद धोती या चूड़ीदार पायजामा पहनते हैं। सिर पर लाल, केसरिया या गुलाबी रंग का राजस्थानी साफा बांधा जाता है। यह रंग-बिरंगी पोशाक नृत्य को और अधिक आकर्षक बना देती है।

नृत्य के दौरान कलाकार हाथों में खांडा या लकड़ी के डंडे रखते हैं और उन्हें आपस में टकराकर ताल बनाते हैं। पैरों में बांधे गए घुंघरू ढोल की थाप के साथ मधुर ध्वनि पैदा करते हैं। कलाकारों की गोलाकार गति, पारंपरिक वेशभूषा और संगीत का मेल गेर नृत्य को बेहद खास बना देता है।

आज गेर नृत्य राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। देश-विदेश में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इसका प्रदर्शन किया जाता है। यह लोकनृत्य राजस्थान की वीरता, परंपरा और सामूहिक भावना को दर्शाता है। बदलते समय के बावजूद गेर नृत्य ने अपनी पहचान और महत्व को बनाए रखा है और आने वाली पीढ़ियों तक राजस्थान की लोक संस्कृति को पहुंचाने का काम कर रहा है।

Next Story