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व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल में सिम-बाइंडिंग क्यों? जानिए वजह

nidhi
23 Oct 2026 2:50 PM IST
व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल में सिम-बाइंडिंग क्यों? जानिए वजह
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व्हाट्सएप से सिग्नल तक सिम-बाइंडिंग की तैयारी

भारत में व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और अन्य मैसेजिंग ऐप्स के तभी काम करने की उम्मीद है, जब उनसे जुड़ा सिम कार्ड एक्टिव हो और यूजर के फोन में मौजूद हो। दूरसंचार विभाग (DoT) का कहना है कि यह नियम एक ऐसी कमी को दूर करने के लिए है जिसका फायदा जालसाज उठाते रहे हैं। वहीं, प्राइवेसी के समर्थक और कुछ यूजर्स को इस बात की चिंता है कि ऐप्स को सिम से इतनी गहराई से जोड़ने पर उन्हें परेशानी हो सकती है और इससे निगरानी (सर्विलांस) का खतरा भी बढ़ सकता है।

नियम क्या कहता है?
ये निर्देश नए नहीं हैं। दूरसंचार विभाग (DoT) ने इन्हें 28 नवंबर 2025 को 'टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स, 2024' के तहत जारी किया था। इस आदेश में आठ ऐप्स के नाम शामिल हैं - व्हाट्सएप, टेलीग्राम, स्नैपचैट, अराट्टई (Arattai), शेयरचैट, जोश, जियोचैट और सिग्नल। संचार मंत्रालय ने कहा है कि इन ऐप्स को डिवाइस में लगे सिम से लगातार जुड़ा रहना होगा, जिससे उस खास एक्टिव सिम के बिना ऐप का इस्तेमाल करना असंभव हो जाएगा।
शुरुआती समय-सीमा के अनुसार, ऐप्स को नियमों का पालन करने के लिए 90 दिन और रिपोर्ट दाखिल करने के लिए 120 दिन दिए गए थे। नियमों के पालन की समय-सीमा को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 कर दिया गया था। यही वजह है कि 1 जनवरी को इन नियमों के लागू होने की तारीख माना जा रहा है।
भारत सरकार ऐसा क्यों कर रही है?
सरकार का तर्क एक खास खामी पर आधारित है। मंत्रालय का कहना है कि मैसेजिंग और कॉलिंग ऐप्स पर अकाउंट तब भी काम करते रहते हैं, जब उनसे जुड़ा सिम निकाल दिया जाए, डीएक्टिवेट कर दिया जाए या उसे विदेश ले जाया जाए। सरकार का तर्क है कि इससे गुमनाम तरीके से घोटाले करना, दूर से 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे फ्रॉड करना और भारतीय नंबरों का इस्तेमाल करके सरकारी अधिकारी बनकर कॉल करना संभव हो जाता है।
दूरसंचार विभाग (DoT) ने कहा है कि फ्रॉड करने वाले नेटवर्क सिम कार्ड खरीदते हैं, मैसेजिंग अकाउंट रजिस्टर करते हैं और फिर उन्हें भारत के बाहर से चलाते हैं। सरकार ने बैंकिंग और UPI ऐप्स का उदाहरण दिया है, जो पहले से ही फोन में मौजूद सिम से जुड़े होते हैं। टेलीकॉम इंडस्ट्री ने भी इस कदम का समर्थन किया है। 'सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' ने सिम-बाइंडिंग को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अहम कदम बताया है।
टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर, एप्पल ने iOS में सिम-बाइंडिंग के लिए सपोर्ट जोड़ दिया है। वहीं, 'बीबॉम' (Beebom) और 'एंड्रॉइड प्योर' (Android Pure) के अनुसार, मेटा ने अप्रैल में 'मीडियानामा' (MediaNama) को पुष्टि की थी कि वह भारत में आम व्हाट्सएप यूजर्स के साथ इस फीचर की टेस्टिंग कर रहा है। उपयोगकर्ताओं के लिए क्या बदलेगा
ज्यादातर लोगों के लिए शायद कुछ भी न बदले। अगर आपका व्हाट्सएप नंबर आपके फोन में लगी सिम से जुड़ा है, तो ऐप पहले की तरह ही काम करता रहेगा। बदलाव कुछ खास स्थितियों में देखने को मिल सकते हैं।
- सिम हटाना या बदलना: अगर रजिस्टर्ड सिम को हटा दिया जाता है, डीएक्टिवेट कर दिया जाता है या बदल दिया जाता है, तो उपयोगकर्ता अपने अकाउंट का एक्सेस खो सकते हैं। सिम या ई-सिम (eSIM) का एक्टिव होना और साइन-अप के लिए इस्तेमाल किए गए नंबर से जुड़ा होना जरूरी है।
- डुअल-सिम फोन: उपयोगकर्ताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके मैसेजिंग अकाउंट से जुड़ा नंबर एक्टिव रहे।
- केवल वाई-फाई का इस्तेमाल: जो लोग बिना रजिस्टर्ड सिम वाले डिवाइस (जैसे कोई दूसरा फोन या टैबलेट) पर मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें यह सोचना पड़ सकता है कि वे कैसे जुड़े रहें।
- यात्री और बार-बार सिम बदलने वाले लोग: जो लोग अक्सर सिम बदलते हैं या यात्रा के दौरान मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें एक्सेस से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नियमों को कैसे लागू किया जाता है।
- वेब और डेस्कटॉप लॉगिन: शुरुआती आदेश में वेब सेशन को हर छह घंटे में लॉग आउट करने और उपयोगकर्ताओं को QR कोड स्कैन करके दोबारा लिंक करने के लिए कहा गया था। बाद में, DoT (दूरसंचार विभाग) ने छह घंटे वाले इस तय नियम को हटा दिया। अब सेशन को तब लॉग आउट किया जाएगा जब रिस्क असेसमेंट (जोखिम का आकलन) के आधार पर ऐसा करना जरूरी हो। हालांकि, लिंक किए गए डिवाइस के उपयोगकर्ताओं को शायद पहले से ज्यादा बार दोबारा कनेक्ट करने के लिए कहा जा सकता है।
आलोचना
'इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन' का कहना है कि छह घंटे वाले नियम को वापस लेने से कुछ राहत तो मिली है, लेकिन ऐप को एक एक्टिव सिम से जोड़ने का मूल विचार अभी भी कायम है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई है कि कोई औपचारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं। उनका तर्क है कि सिम और ऐप के बीच लगातार जुड़ाव होने से डिवाइस और ऐप के इस्तेमाल के समय की लगातार ट्रैकिंग होती है।
अन्य आलोचकों का मानना ​​है कि यह डिजिटल बातचीत के दौरान लोगों की पहचान को 'रियल-टाइम आइडेंटिटी ग्रिड' (वास्तविक समय की पहचान प्रणाली) से जोड़ने की दिशा में एक कदम है। वहीं, इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय पहले से ही आधार, पैन और बैंक KYC डेटा सरकार के साथ साझा करते हैं, इसलिए ऐप को सिम से जोड़ने से मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता। यह तर्क लेखक के.बी.एस. सिद्धू जैसे विश्लेषकों ने 'सबस्टैक' (Substack) पर दिया है।
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