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बॉलीवुड में गूंजी 'ऑपरेशन सफेद सागर' की गाथा

Saba Naaz
24 July 2026 2:35 PM IST
बॉलीवुड में गूंजी ऑपरेशन सफेद सागर की गाथा
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मुंबई। सीमा पर मिली जीत हर भारतवासी को रोमांचित करती है क्योंकि यह केवल युद्ध का अंत नहीं, बल्कि अदम्य साहस, रणनीति, सर्वोच्च त्याग और राष्ट्रीय गर्व का चरम क्षण होती है। जब यही शौर्य और बलिदान की कहानियां बड़े पर्दे पर उतरती हैं, तो दर्शक केवल सिनेमा नहीं देखते, बल्कि तिरंगे के सम्मान और देशप्रेम को अपने भीतर गहराई से महसूस करते हैं। 'ऑपरेशन सफेद सागर' और कारगिल युद्ध के ऐतिहासिक शौर्य को सिनेमा के माध्यम से जीवंत करने के पीछे कलाकारों, निर्देशकों और निर्माताओं की कड़ी मेहनत और गहरी जिम्मेदारी की भावना छिपी होती है।

30 हजार फीट की ऊंचाई पर गूंजी 'ऑपरेशन सफेद सागर' की अमर गाथा

'अब या तो हम इतिहास रचेंगे, या इतिहास बन जाएंगे'—वेब सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' का यह संवाद 26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में मिली ऐतिहासिक विजय के जज्बे को बयां करता है। भारतीय वायुसेना के इस ऐतिहासिक ऑपरेशन ने दुर्गम पहाड़ियों पर छिपे घुसपैठियों को खदेड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। सीरीज में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के बलिदान को प्रमुखता से दिखाया गया है।

इस भूमिका को निभाने वाले अभिनेता सिद्धार्थ का कहना है कि सैन्य वर्दी पहनकर ऐसा किरदार निभाना उनके लिए एक बेहतरीन शैक्षणिक अनुभव रहा। उन्होंने बताया कि हालांकि हम वास्तविक जीवन में सैनिक नहीं होते, लेकिन कलाकारों को उन किरदारों को जीने का अवसर मिलता है। जब देश का युवा पर्दे पर सेना के अफसरों को साहसी काम करते देखता है, तो उसमें देश के प्रति एक नई सोच और प्रेरणा जगती है।

वास्तविक लोकेशन पर सैनिकों के जज्बातों को जीने की कोशिश

सिनेमा के जरिए युद्ध की जीत को दिखाना केवल एक्शन दृश्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जवानों के अनुशासन और जज्बातों को पूरी ईमानदारी से महसूस करने का प्रयास है। फिल्म 'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल' में फ्लाइट कमांडर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने अपने अनुभव साझा किए।

उन्होंने बताया कि जिस इलाके में गुंजन सक्सेना ने युद्ध के दौरान घायल सैनिकों को रेस्क्यू किया था, उसी वास्तविक लोकेशन पर शूटिंग करना एक अद्भुत अहसास था। हेलिकॉप्टर का पंखा शुरू होते ही वर्दी में महसूस होता था कि यह सब सच में घटित हुआ था। वास्तविक युद्ध क्षेत्र में रीशूट का कोई मौका नहीं होता और जीवन दांव पर लगा रहता है, यही विचार शूटिंग के दौरान दिमाग में बना रहता था।

नई पीढ़ी में देशभक्ति का जज्बा जगाने का माध्यम

युद्ध पर आधारित फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपने वीर जवानों के त्याग से परिचित कराने का सशक्त जरिया हैं। प्रसिद्ध निर्देशक जेपी दत्ता का मानना है कि युद्ध नायकों पर ज्यादा से ज्यादा फिल्में बननी चाहिए। लोगों को यह समझना जरूरी है कि देश की सीमा पर मिलने वाली हर जीत की एक बड़ी कीमत होती है, जिसके लिए जवान अपने परिवारों को पीछे छोड़ देते हैं। सिनेमा के माध्यम से अगर युवाओं को सेना में शामिल होने या देश सेवा की प्रेरणा मिलती है, तो यह देश के प्रति एक बड़ा योगदान है।

निर्माता समर खान के अनुसार, सैन्य वर्दी पहनते ही देशभक्ति का भाव अपने आप जाग उठता है। जब कोई कलाकार स्क्रीन पर तिरंगे को सलाम करता है या दुश्मन का सामना करता है, तो वह पल केवल अभिनय न रहकर एक वास्तविक अहसास बन जाता है। यही भाव पर्दे के जरिए दर्शकों के दिलों तक पहुँचता है और देशप्रेम की लहर पैदा करता है।

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