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मोहम्मद रफी के गाने से जुड़ा हैरान करने वाला किस्सा, आज भी है मशहूर

Saba Naaz
19 July 2026 8:26 PM IST
मोहम्मद रफी के गाने से जुड़ा हैरान करने वाला किस्सा, आज भी है मशहूर
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मनोरंजन: हिंदी सिनेमा के महान गायकों में शामिल मोहम्मद रफी की आवाज आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में बसती है। उनकी गायकी में ऐसी मिठास और भावनाएं थीं कि हर गीत सुनने वाले को अपनी कहानी जैसा महसूस होता था। रफी साहब के करियर से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं, लेकिन उनका एक ऐसा किस्सा भी है जिसमें रिकॉर्डिंग के दौरान हुई एक छोटी सी गलती को संगीतकारों ने कमजोरी नहीं, बल्कि गाने की खूबसूरती मान लिया था।

यह किस्सा साल 1955 में आई फिल्म 'सीमा' के मशहूर गीत 'कहां जा रहा है तू ऐ जाने वाले' से जुड़ा है। इस गीत को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी थी। फिल्म में यह गाना अभिनेता बलराज साहनी और अभिनेत्री नूतन पर फिल्माया गया था। इस भावुक गीत का संगीत मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने तैयार किया था, जबकि इसके बोल गीतकार शैलेन्द्र ने लिखे थे।

रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो का माहौल बेहद शांत था। रफी साहब अपनी आदत के मुताबिक आंखें बंद करके पूरी तरह गीत की भावनाओं में डूब गए थे। उनकी आवाज में दर्द और एहसास साफ महसूस हो रहा था। गाना धीरे-धीरे अपने सबसे भावुक हिस्से की ओर बढ़ रहा था।

गीत की आखिरी पंक्तियों में जब रफी साहब ने "कभी तूने सोचा कि मंजिल कहां है?" और इसके बाद "जो बांधे थे बंधन, वो क्यों तोड़ डाले" जैसे शब्द गाए, तभी अचानक उनकी आवाज में हल्का कंपन आ गया। गाने के दौरान उनके गले में थोड़ी खराश महसूस हुई और आवाज में बदलाव आ गया।

तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह एक गलती मानी जा सकती थी। रफी साहब खुद इस बात को लेकर परेशान हो गए थे। वह बेहद प्रोफेशनल गायक थे और अपनी रिकॉर्डिंग में छोटी से छोटी कमी को भी स्वीकार नहीं करते थे। रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद उन्होंने संगीतकार शंकर-जयकिशन से कहा कि उनकी आवाज में खराबी आ गई है और इस हिस्से को दोबारा रिकॉर्ड करना चाहिए।

लेकिन शंकर-जयकिशन ने दोबारा टेक लेने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि गाना बिल्कुल सही है और इसे ऐसे ही रखा जाएगा। रफी साहब इस फैसले से हैरान थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि आवाज में आई खराश गाने की कमी बन जाएगी।

हालांकि, संगीतकारों ने उस छोटी सी गलती में भी एक बड़ी खूबसूरती देख ली थी। उनका मानना था कि आवाज में आया वह कंपन किसी तकनीकी गलती जैसा नहीं लग रहा था, बल्कि ऐसा महसूस हो रहा था जैसे गाने में दिखाया गया दर्द सच में आवाज के जरिए बाहर आ गया हो। उन्होंने कहा कि जिस तरह किसी का दिल टूटने पर आवाज कांपती है, ठीक वैसा ही एहसास उस हिस्से में आ रहा है।

यही वजह थी कि शंकर-जयकिशन ने उस हिस्से को हटाने के बजाय उसे अंतिम रिकॉर्डिंग में शामिल रखा। समय के साथ वही हल्की सी खराश और कंपन इस गीत की सबसे खास पहचान बन गई। आज भी जब लोग इस गाने को सुनते हैं तो उसमें रफी साहब की आवाज का दर्द और भावनाओं की गहराई महसूस करते हैं।

मोहम्मद रफी की यही खासियत थी कि वह सिर्फ सुरों के कलाकार नहीं थे, बल्कि भावनाओं को आवाज देने वाले गायक थे। उनके लिए हर शब्द का अपना महत्व था और वह गीत की आत्मा तक पहुंचने की कोशिश करते थे। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज दशकों बाद भी लोगों को उतनी ही प्रभावित करती है।

'कहां जा रहा है तू ऐ जाने वाले' आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार गीतों में गिना जाता है। इस गीत से जुड़ा यह किस्सा बताता है कि कई बार कलाकार की छोटी सी अनजानी गलती भी कला का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन जाती है। रफी साहब की वह आवाज की हल्की कंपन ही इस गीत की भावनाओं को और गहरा कर गई और इसे इतिहास में अमर बना दिया।

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