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श्रद्धा कपूर की फिल्म 'ईथा' ने अपने ट्रेलर से सबका ध्यान खींचा है और महाराष्ट्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सबके सामने ला खड़ा किया है। फिल्म की खास बातों में से एक है - मशहूर 'नवारी' साड़ी। नौ गज लंबी यह साड़ी महाराष्ट्र की परंपरा का एक अहम हिस्सा है। फिल्म के ट्रेलर में इस पारंपरिक पहनावे के बचाव में एक दमदार संवाद है। आइए, नवारी साड़ी, इसके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं।
नवारी साड़ी के बारे में सब कुछ
'नवारी' का क्या अर्थ है?
'नवारी' शब्द दो मराठी शब्दों से मिलकर बना है: 'नौ' (यानी नौ) और 'वारी' (यानी गज)। इसका मतलब है नौ गज लंबे कपड़े के एक ही टुकड़े से बनी साड़ी। नवारी साड़ी को 'लुगडे' या 'कष्टा' के नाम से भी जाना जाता है।
नवारी साड़ी का इतिहास
नवारी साड़ी की जड़ें पुराने मराठा साम्राज्य से जुड़ी हैं, खासकर पश्चिमी दक्कन क्षेत्र में, जिसमें आज का महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्से आते हैं। 17वीं से 19वीं सदी के बीच प्रचलित यह धोती-नुमा साड़ी महिलाएं इसलिए पहनती थीं ताकि उन्हें चलने-फिरने में आसानी हो। इससे उन्हें युद्ध के समय तेजी से आगे बढ़ने, घुड़सवारी करने और खेती-बाड़ी के काम करने में मदद मिलती थी।
इसे पहनने का तरीका अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग होता था। जैसे, कोली समुदाय की मछुआरे महिलाएं इसे घुटनों से काफी ऊपर तक पहनती थीं, जबकि ब्राह्मण और मराठा परिवारों की महिलाएं इसे अधिक भव्य तरीके से पहनना पसंद करती थीं।
वे मशहूर महिलाएं जिन्होंने नवारी साड़ी को साहस और गौरव का प्रतीक बनाया
राजमाता जीजाबाई, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अहिल्याबाई होल्कर जैसी ऐतिहासिक हस्तियां इस पारंपरिक नौ गज की साड़ी से जुड़ी रही हैं। वहीं, समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले और आनंदीबाई जोशी को भी इस पारंपरिक महाराष्ट्रीयन पहनावे में देखा गया है। लोक कला की दुनिया में, लावणी और तमाशा की दिग्गज कलाकार विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर भी इस पारंपरिक साड़ी को पूरे गर्व के साथ पहनती थीं। अब, श्रद्धा कपूर फिल्म 'ईथा' में विठाबाई की विरासत को पर्दे पर लेकर आ रही हैं। फिल्म का ट्रेलर दिखाता है कि नवारी साड़ी सिर्फ एक पहनावा नहीं, बल्कि उससे कहीं बढ़कर है। ट्रेलर में श्रद्धा कहती हैं, "ये सिर्फ कपड़ा नहीं, अभिमान है। जिसे पहनने को मिले, वो भाग्यवान है। अरे, मराठी सास का सम्मान है ये और मराठी मान की पहचान है।"
नौवारी साड़ी कौन पहनता है और किन मौकों पर पहनी जाती है?
नौवारी साड़ी महाराष्ट्र की हर उम्र और समुदाय की महिलाएं पहनती हैं - चाहे वो दुल्हनें हों, लावणी कलाकार हों, या फिर त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में हिस्सा लेने वाली महिलाएं। इस पारंपरिक नौ-गज की साड़ी से जुड़े कुछ खास मौके और समूह इस प्रकार हैं:
शादियां: महाराष्ट्रीयन दुल्हनें अक्सर पारंपरिक शादी की रस्मों के लिए नौवारी साड़ी चुनती हैं। शादी में शामिल होने वाली महिलाएं और मेहमान भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने के लिए इसे पहनती हैं।
गुड़ी पड़वा: महाराष्ट्रीयन नव वर्ष मनाने के लिए महिलाएं नौ-गज की यह साड़ी पहनती हैं, जिसके साथ अक्सर पारंपरिक गहने और 'नथ' भी पहनी जाती है।
गणेश चतुर्थी: गणेश उत्सव, आरती और शोभा यात्राओं में हिस्सा लेने वाली महिलाओं के बीच यह एक लोकप्रिय विकल्प है।
लावणी और तमाशा: नौवारी, पारंपरिक लावणी पोशाक का एक अहम हिस्सा है। धोती के स्टाइल में पहनी जाने वाली यह साड़ी नृत्यांगनाओं को आसानी से हिलने-डुलने की आज़ादी देती है, जिससे वे ऊर्जावान नृत्य कर पाती हैं।
धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार: महिलाएं इसे पूजा-पाठ, पारिवारिक कार्यक्रमों और अन्य पारंपरिक उत्सवों के दौरान पहनती हैं।
कोली समुदाय: मछुआरा समुदाय (कोली समाज) की महिलाएं पारंपरिक रूप से थोड़ी छोटी नौवारी साड़ी पहनती हैं, जो मछली पकड़ने के उनके काम-काज के हिसाब से काफी सुविधाजनक होती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम: महाराष्ट्रीयन लोक नृत्य, ऐतिहासिक नाटकों और सामुदायिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वाली महिलाएं अक्सर अपनी क्षेत्रीय पहचान दिखाने के लिए नौवारी साड़ी चुनती हैं।
रोज़मर्रा का पहनावा: हालांकि शहरों में इसका चलन कम हो गया है, लेकिन महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली कुछ बुजुर्ग महिलाएं और अन्य महिलाएं आज भी रोज़मर्रा के कपड़ों के तौर पर इस पारंपरिक साड़ी को पहनती हैं।
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