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यादगार संजीव कुमार: जब 'शोले' के ठाकुर ने हर किरदार को जीवंत कर दिया
Tara Tandi
8 July 2026 6:58 PM IST

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मुंबई: 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में जन्मे हरिहर जेठालाल जरीवाला (संजीव कुमार) के अभिनय की जड़ें मुंबई के 'इप्टा' (आईपीटीए) और 'इंडियन नेशनल थिएटर' के मंच से जुड़ी थीं। उन्हें प्यार से 'हरिभाई' के नाम से भी जाना जाता है।
मात्र 22 वर्ष की आयु में आर्थर मिलर के नाटक 'ऑल माई संस' में उन्होंने एक वृद्ध पिता का अभिनय किया था। इसके बाद, उन्होंने एके हंगल के निर्देशन में नाटक 'डमरू' में 60 वर्षीय पिता की भूमिका निभाई। जब उन्होंने फिल्मों का रुख किया तो निर्देशक एस्पी ईरानी की सलाह पर उन्होंने अपना नाम 'संजय कुमार' से बदलकर 'संजीव कुमार' कर लिया ताकि उभरते हुए अभिनेता संजय खान से उनका नाम न टकराए।
सिनेमा में 1960 की फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' में एक छोटी सी भूमिका से शुरुआत करने के बाद संजीव कुमार ने अपनी सहजता और प्रतिभा के बल पर हिंदी सिनेमा के स्थापित नायकों को चुनौती दी।
ऐसा कहा जाता है कि उनके अभिनय की नम्रता का एक बड़ा उदाहरण फिल्म 'आंधी' (1975) के सेट पर दिखा। फिल्म के एक दृश्य में उनके गुरु और वरिष्ठ आर्टिस्ट एके हंगल को संजीव कुमार का कोट उठाना था। संजीव कुमार ने इस बात पर आपत्ति जताई कि वे अपने सीनियर से ऐसा काम नहीं करवाएंगे। तब एके हंगल ने उन्हें समझाया कि कैमरे के सामने वे केवल अपने चरित्र के प्रति जवाबदेह हैं, वास्तविक जीवन के पदानुक्रम के प्रति नहीं।
संजीव कुमार ने भारतीय सिनेमा को मूक-बधिर चरित्र की मूक वेदना से लेकर 'नया दिन नयी रात' (1974) में नौ अलग-अलग रसों को दर्शाते नौ किरदारों की अविश्वसनीय विविधता प्रदान की। 'शोले' (1975) का ठाकुर बलदेव सिंह तो इतिहास में दर्ज हो गया।
संजीव कुमार ने 1968 में 'शिकार' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार जीता। 'खिलौना' (1970) से राष्ट्रीय पहचान मिली। 'दस्तक' (1971) और 'कोशिश' (1973) के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) मिला। 'आंधी' (1975) और 'अर्जुन पंडित' (1976) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। 'अंगूर' (1982) में उनकी दोहरी हास्य भूमिका को समीक्षकों ने श्रेष्ठ कॉमेडी प्रदर्शन माना।
संजीव कुमार का निजी जीवन एक अधूरी और दर्दभरी दास्तान बनकर रह गया। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म 'सीता और गीता' (1972) की शूटिंग के दौरान महाबलेश्वर में 'हवा के साथ-साथ' गाने के फिल्मांकन के वक्त एक ट्रॉली हादसा हुआ, जिसमें वे और हेमा मालिनी बाल-बाल बचे। इस घटना ने दोनों को करीब ला दिया। वे शादी करना चाहते थे और उनकी माता शांतशरण ने भी सहमति दे दी थी। संजीव कुमार की पारंपरिक मांग थी कि हेमा शादी के बाद काम छोड़ दें, जिसे हेमा की मां ने अस्वीकार कर दिया, जिससे यह रिश्ता टूट गया। इसके बाद सुलक्षणा पंडित ने उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने अपनी मृत्यु के पूर्वाभास के चलते किसी की जिंदगी न उजाड़ने का फैसला करते हुए मना कर दिया।
6 नवंबर 1985 को संजीव कुमार इस संसार से विदा हो गए। उनकी विरासत को याद करते हुए उनके गृहनगर सूरत में 108 करोड़ रुपए की लागत से 'संजीव कुमार ऑडिटोरियम' का निर्माण किया गया और 2013 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।
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