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Jagjit Singh Birthday: शायरों की महफ़िलों में सराही जाने वाली ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुँचाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो हैं जगजीत सिंह। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू का कम ज्ञान रखने वालों में शायरी की समझ बढ़ाई बल्कि उन्हें ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फिराक जैसे शायरों से भी परिचित कराया।[1] हिंदी, उर्दू, पंजाबी, भोजपुरी समेत कई भाषाओं में गाने वाले जगजीत सिंह को साल 2003 में भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
जगजीत सिंह (अंग्रेज़ी: Jagjit Singh, जन्म: 8 फ़रवरी, 1941; मृत्यु: 10 अक्टूबर, 2011) ग़ज़लों की दुनिया के बादशाह और मशहूर ग़ज़ल गायक थे जिन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ से लाखों श्रोताओं के दिलों पर राज किया। जगजीत जी का जन्म 8 फ़रवरी, 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। उनके पिता सरदार अमर सिंह धामानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत जी का परिवार मूल रूप से पंजाब के रोपड़ जिले के दल्ला गांव का रहने वाला है। उनकी मां बच्चन कौर पंजाब के समरल्ला के उत्तालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत का बचपन का नाम जीत था। लाखों श्रोताओं के साथ, सिंह साहब जगजीत बन गए जिन्होंने कुछ ही दशकों में दुनिया को जीत लिया। [1]
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में प्राप्त की और बाद में आगे की पढ़ाई के लिए जालंधर आ गए। उन्होंने डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और उसके बाद उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। [1]
उन्हें बचपन में अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। उन्होंने गंगानगर में ही पंडित छगन लाल शर्मा के मार्गदर्शन में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया। बाद में उन्होंने सैनी घराने के उस्ताद जमाल खान साहब से ख़याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियाँ सीखीं।[2] उनके पिता चाहते थे कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत गायक बनने पर अड़े थे। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान संगीत में उनकी रुचि को देखते हुए कुलपति प्रोफेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह को बहुत प्रोत्साहित किया। उनके आग्रह पर वे 1965 में मुंबई आ गए।
जगजीत सिंह पेइंग गेस्ट के रूप में रहते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल गाकर या शादियों और अन्य समारोहों में गाकर अपनी आजीविका चलाते थे। यहीं से उनके संघर्ष का दौर शुरू हुआ।[2] इसके बाद फिल्मों में हिट संगीत देने की उनकी सारी कोशिशें बुरी तरह विफल रहीं। कुछ साल पहले डिंपल कपाड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म 'लीला' का संगीत औसत था। 1994 में खुदाई, 1989 में बिल्लू बादशाह, 1989 में कानून की आवाज, 1987 में राही, 1986 में ज्वाला, 1986 में लौंग दा लश्कारा, 1984 में रावण और 1982 में सितम के न तो गाने लोकप्रिय हुए और न ही फिल्में।
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