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Entertainment, मनोरंजन : चार दशकों से भी अधिक समय से भारतीय सिनेमा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनाने वाले Paresh Rawal ने अपने विविध किरदारों से टैलेंट की नई परिभाषाएँ दी हैं। चाहे वह व्यंग्यप्रधान ड्रामा Sardar हो या सदाबहार कॉमेडी Hera Pheri — उन्होंने हर बार अपनी कला के नए आयाम खोजे। लेकिन उस लोकप्रियता की परछाई में, उस किरदार ने उन्हें एक ऐसा एहसास दिलाया है जिसे वे वरदान और बोझ दोनों मानते हैं: बाबूराव गणपतराव आप्टे।
बाबूराव का किरदार 2000 में रिलीज़ हुई फिल्म “Hera Pheri” में सामने आया, जिसमें Rawal ने अनाड़ी लेकिन प्यारे मकान‑मालिक की भूमिका से दर्शकों का दिल जीत लिया। इस भूमिका की मासूमियत, कॉमेडी‑टाइमिंग और सरलता ने इसे हिंदी सिनेमा के सबसे प्रिय किरदारों में शुमार कर दिया। Rawal ने स्वयं कहा है कि बाबूराव में उन्हें एक ऐसे किरदार का हिस्सा बनने का गर्व है, जो “R. K. Laxman और Charlie Chaplin जैसे चरित्रों की तरह है”।
हालाँकि, उसी सफलता के साये में उन्होंने अपने लिए एक चुनौती भी महसूस की। Rawal ने खुलासा किया है कि इस किरदार ने उन्हें ‘छवि‑कैद’ में ला दिया। उन्होंने कहा कि बाबूराव की छवि उनके गले में फंदे की तरह बन गई है। उन्होंने बताया:
वे इस बात से चिंतित थे कि बाबूराव का किरदार उनकी बाकी भूमिकाओं, उनकी विविधता और अभिनेतृगत आज़ादी को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि 2007 में उन्होंने निर्देशक Vishal Bhardwaj से मिलकर कहा था‑ “मुझे इस इमेज से मुक्ति चाहिए”।
इसके पीछे कारण था कि उन्हें महसूस हुआ कि हर प्रस्ताव में “बाबूराव का किरदार” सामने आता है, भले ही भूमिका पूरी तरह उसी तरह न हो।
दूसरी ओर, दर्शकों की ओर से इस किरदार को मिली प्रेम और प्रतिक्रियाएँ भी अतुलनीय रही हैं। Rawal ने बताया‑ एक ८२ वर्षीय श्रोता ने उनसे कहा कि जब वह उदास होते हैं, तो “Hera Pheri” की DVD निकालकर देख लेते हैं। उस वक्त उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने “कुछ अच्छा किया है”।
इस तरह, बाबूराव उनका वरदान बन गया — वह किरदार जो उन्हें लोकप्रियता और प्यार दिलाया — और बोझ भी बन गया — वह छवि जो उन्हें आगे बढ़ने से रोकती हुई लगी। Rawal ने कहा‑
वे स्पष्ट हैं कि यदि उन्हें फिर से इस प्रकार की भूमिका करनी हो, तो कहानी में कुछ नया‑अनूठा होना चाहिए। केवल वही गेट‑अप पहनकर वही पुरानी कॉमेडी दोहराना उन्हें उत्साहित नहीं करता।
कुल मिलाकर, Paresh Rawal के इस बयान ने एक दिलचस्प तथ्य सामने रखा है कि लोकप्रिय किरदार कितने भी दर्जे में हों — एक कलाकार के लिए उन्हें निभाना कभी कभी श्रेय और कभी कभी जंजीर दोनों बन जाता है। बाबूराव के माध्यम से उनके लिए यह सफर प्रेरणा और सीमितता, दोनों ही रहा। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वे चाहेंगे अपनी प्रतिभा को नई दिशाओं में आज़माना, जहां पहचान मिले और विविधता भी बनी रहे।
अगर आप चाहें, तो मैं इस बारे में एक विस्तृत विश्लेषण भी ला सकता हूँ कि कैसे बॉलीवुड में कलाकार प्रकार‑कैद की समस्या से जूझते हैं और किस तरह ऐसी लोकप्रिय भूमिकाएँ उन्हें आगे बढ़ने से रोक सकती हैं।
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