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12 घंटे की शिफ्ट क्रिएटिविटी की दुश्मन, फैक्ट्री की तरह होने लगा है फिल्मों में काम: विवेक रंजन अग्निहोत्री

jantaserishta.com
22 Jan 2026 9:36 AM IST
12 घंटे की शिफ्ट क्रिएटिविटी की दुश्मन, फैक्ट्री की तरह होने लगा है फिल्मों में काम: विवेक रंजन अग्निहोत्री
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मुंबई: फिल्म इंंडस्ट्री में शूटिंग के दौरान 12 घंटे की शिफ्ट का मुद्दा गर्माया है। कुछ इसे सही तो कुछ गलत बता रहे हैं। इस बीच किसी भी विषय पर मुखर रहने वाले फिल्म निर्माता-निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने आईएएनएस से खुलकर बात की। इस दौरान उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में लंबे काम के घंटों की समस्या पर गंभीर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में 12 घंटे या उससे ज्यादा की शिफ्ट चलाना एक बड़ी और गंभीर समस्या है। यह काम क्रिएटिव फील्ड होने के बावजूद फैक्ट्री जैसा बन गया है, जहां लोग थककर चूर हो जाते हैं और उनकी क्रिएटिविटी खत्म हो जाती है।
अग्निहोत्री ने बताया कि मेकअप, विग, मूंछ-दाढ़ी लगाकर काम करना बहुत मुश्किल होता है। सात-आठ घंटे के बाद मेकअप भी उतरने लगता है। प्रॉस्थेटिक्स ढीले पड़ने लगते हैं और व्यक्ति शारीरिक-मानसिक रूप से थक जाता है। शाम के बाद इंसान की एनर्जी अलग होती है, जबकि सुबह की अलग लेकिन पैसा बचाने के लिए कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा काम निकालने की कोशिश की जाती है। भारत में अभावों की वजह से लोग इसे सहन कर लेते हैं। उनके पास अधिकारों की जानकारी भी कम होती है और कोई सख्त नियम नहीं हैं।
निर्देशक ने कहा कि 12 घंटे लगातार क्रिएटिव काम करते रहना असंभव है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक पेंटर से कहें कि 12 घंटे पेंटिंग करता रहे या गायक से कहें कि गाता रहे, तो वह भी थक जाएगा, जब तक कि वह नशे में न हो। फिल्में फैक्ट्री की तरह चल रही हैं, जहां 12 घंटे की शिफ्ट 13-14 घंटे तक खिंच जाती है। मुंबई जैसे शहर में आने-जाने में एक-दो घंटे और लगते हैं, जिससे कुल 14-16 घंटे काम हो जाता है। अगले दिन फिर सुबह उठकर आना पड़ता है। खासकर एक्टर्स के लिए यह मुश्किल है। उन्हें हमेशा सुंदर, खुश और फ्रेश दिखना होता है। लंबे घंटों के बाद यह कैसे संभव है?
उनका मानना है कि बदलाव जरूरी है ताकि फिल्में बेहतर बन सकें और लोग स्वस्थ रह सकें। विवेक रंजन ने खुद का अनुभव साझा करते हुए कहा कि एक शिफ्ट के बाद तो मेरी भी क्रिएटिविटी खत्म हो जाती है। दिमाग काम नहीं करता, शारीरिक थकान के साथ भावनात्मक रूप से भी थक जाता हूं। इस मुद्दे पर गहन चिंतन होना चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री की यूनियंस, संगठन और सभी पक्षों को मिलकर बैठना चाहिए। चर्चा कर एक समाधान निकालना जरूरी है। लंबे समय तक काम न सिर्फ स्वास्थ्य बिगाड़ता है, बल्कि क्रिएटिविटी और क्वालिटी को भी प्रभावित करता है।
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