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फाइल फोटो
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरु गोबिंद सिंह के बेटों के बलिदान का सम्मान करने के उद्देश्य से आयोजित वीर बाल दिवस कार्यक्रम में यह सही कहा कि हमें इतिहास के नाम पर गढ़ा हुआ विमर्श पढ़ाया जाता रहा।
जनता से रिश्ता वबेडेस्क | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरु गोबिंद सिंह के बेटों के बलिदान का सम्मान करने के उद्देश्य से आयोजित वीर बाल दिवस कार्यक्रम में यह सही कहा कि हमें इतिहास के नाम पर गढ़ा हुआ विमर्श पढ़ाया जाता रहा। वह यह बात पहले भी कई अवसरों पर कह चुके हैं। उनके अतिरिक्त केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी इतिहास लेखन की विसंगतियों का उल्लेख कर चुके हैं। जैसे प्रधानमंत्री ने वीर बाल दिवस के अवसर पर कहा कि गलत तरीके से पढ़ाए जाने वाले इतिहास को बदलने की आवश्यकता है, वैसे ही अनेक केंद्रीय मंत्री भी इस पर बल दे चुके हैं। इस सबके बाद भी इतिहास लेखन की विसंगतियों को दूर करने और विशेष रूप से संकुचित एवं एकतरफा दृष्टिकोण वाले इतिहास को बदलने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं।
परिणाम यह है कि तथ्यों की अनदेखी करने वाला इतिहास अभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा है। यह किस हद तक है, इसका प्रमाण इससे मिलता है कि प्रधानमंत्री ने जिस क्रूर औरंगजेब की दरिंदगी की चर्चा की, उसके बारे में इतिहास की कई किताबें यह बताती हैं कि वह एक दयालु शासक था। आखिर उसके दुष्कृत्यों पर कब तक पर्दा डालकर भावी पीढ़ी से वास्तविकता छिपाई जाती रहेगी? वास्तव में ऐसे एक नहीं, अनेक प्रश्न हैं। कुछ प्रश्न तो ऐसे हैं, जो न जाने कब से पूछे जा रहे हैं, लेकिन उनका उत्तर मिलने का नाम नहीं ले रहा है।
सभी इससे अवगत हैं कि देश के इतिहास के नाम पर छात्रों को दिल्ली का इतिहास अधिक पढ़ाया जाता है। इसके चलते दिल्ली पर शासन करने वाले शासकों के बारे में तो विस्तार से पढ़ाया जाता है, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों और विशेष रूप से दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के अनेक प्रतापी राजाओं एवं योद्धाओं के बारे में सामान्य जानकारी भी नहीं दी जाती। कम से कम अब तो इतिहास को समावेशी रूप में समग्रता से पढ़ाने के उपाय किए ही जाने चाहिए।
ध्यान रहे कि पाठ्यक्रम परिवर्तन की दिशा में वैसे प्रयत्न नहीं हुए हैं, जैसे अब तक हो जाने चाहिए थे। उचित यह होगा कि सरकार अपने स्तर पर यह पहल करे कि इतिहास का पाठ्यक्रम प्राथमिकता के आधार पर संशोधित-परिवर्तित किया जाए। इसका कोई अर्थ नहीं कि अंग्रेजों अथवा उनसे प्रभावित वामपंथी इतिहासकारों की ओर से लिखा गया इतिहास स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी पढ़ाया जाता रहे-और वह भी तब जब हमारे नीति-नियंता यह मान रहे हैं कि इतिहास को लेकर एक ऐसा विमर्श गढ़ा गया, जो हमारे अंदर हीन भावना पैदा करे। इतिहास लेखन में सुधार केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि वह गलत तरीके से लिखा गया, बल्कि इसलिए भी किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी राष्ट्र के मूल्य तब सुरक्षित रहते हैं, जब वर्तमान पीढ़ी के सामने अतीत के आदर्श स्पष्ट रहते हैं।
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