सम्पादकीय

ताइवान पर तकरार

Subhi
5 Aug 2022 5:12 AM GMT
ताइवान पर तकरार
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क्या ताइवान अगला यूक्रेन बनेगा? लगता तो कुछ ऐसे ही है। अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी की यात्रा ने ताइवान की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। अब आगे देखना होगा कि उनकी यात्रा की परिणिति क्या होती है

Written by जनसत्ता: क्या ताइवान अगला यूक्रेन बनेगा? लगता तो कुछ ऐसे ही है। अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी की यात्रा ने ताइवान की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। अब आगे देखना होगा कि उनकी यात्रा की परिणिति क्या होती है? चीन के पड़ोसी देश उसकी विस्तार वाली नीतियों से लगातार परेशान होते रहे हैं। भारत भी अपनी स्वतंत्रता से चीन की विस्तारवादी नीतियों से परेशान होता रहा है। चीन ने तो हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन को हमसे छीन लिया है। यदि चीन की विस्तारवादी नीतियों को नहीं रोका गया तो, इसका दुष्परिणाम विश्व समुदाय को झेलना पड़ेगा।

यूक्रेन को अमेरिका ने नाटो संधि में शामिल होने पर उसकी सुरक्षा का वादा किया था, मगर ऐन वक्त पर अमेरिका ने उसका सहयोग नहीं किया। उसका परिणाम यह हुआ कि यूक्रेन आज पूर्णत: बर्बादी रास्ते पर है। ताइवान को यहां बहुत सचेत रहने की आवश्यकता है। उसे किसी प्रकार के अमेरिकी उकसावे में न आकर समझदारी से काम लेना चाहिए।

ताइवान कि भौगोलिक सीमाएं चीन से लगती हैं, ऐसे में वह हजारों किलोमीटर दूर बैठे अमेरिका से रोज-रोज किस प्रकार की सहायता ले सकेगा। जिन भी छोटे देशों ने अपने पड़ोसी बड़े दुश्मनों से अच्छे संबंध नहीं रखे हैं, उनको दुष्परिणाम झेलने पड़े हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है पाकिस्तान। पाकिस्तान की भारत विरोधी नीतियों ने उसे आज कंगाल कर दिया है। पाकिस्तान जिन आतंकवादियों का प्रयोग भारत के विरुद्ध करता है, आज उन्हीं आतंकवादियों के कारण में परेशान हो रहा है। अंत: जो गलती यूक्रेन ने की है, पड़ोसी मुल्क के साथ वह गलती ताइवान को कदापि नहीं करनी चाहिए।

पूरी सावधानी बरतने के बाद भी अगर ताइवान चीन के मध्य युद्ध की स्थिति बनती है, तो यह विश्व के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी। पूरा विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है। कई देश तो दिवालिया होने के कगार पर आ गए हैं। विश्व समुदाय के सभी बड़े नेताओं को प्रयास करना चाहिए कि चीन और ताइवान के बीच जो संभावित तनाव उग्र रूप लेने वाला है, उसको समय रहते समाप्त करने के भरसक प्रयास करें।

उल्लेखनीय है कि ताइवान और उसके आसपास से लगे क्षेत्र दुनिया भर में व्यापार के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय माने जाते हैं। इन्हीं क्षेत्रों से विश्व का लगभग अस्सी फीसद व्यापार संचालित होता है। अगर इस क्षेत्र में युद्ध होता है तो विश्व के सभी देशों की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर नुकसान होगा और इसका खमियाजा विकासशील और अविकसित देशों को झेलना पड़ेगा। विश्व का कोई भी देश आज युद्ध नहीं चहाता।

संसद में महंगाई पर चर्चा के दौरान सांसद जयंत सिन्हा ने जिस तरह कहा कि मुझे तो महंगाई ढूंढ़ने से भी नहीं दिखाई दे रही है। महंगाई कहां है। वाकई, उन्होंने सही तो कहा। महंगाई है कहां? क्योंकि जनता के वोट से चुने गए जनप्रतिनिधियों को जनता की गाढ़ी कमाई से भरे गए खजाने से इतना भारी भरकम वेतन भत्ते, सुख सुविधाएं, पेंशन, सबसिडी पर खाना-पीना मिलता है, तो भला इन गरीबों को महंगाई ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगी! जनता को इसी में संतोष कर लेना चाहिए कि एकै साधे सब सधे। उनके जनप्रतिनिधियों की पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में हैं, तो आम जनता पर भी महंगाई डायन का कोई असर नहीं है!


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