सम्पादकीय

World Theater Day: जिंदगी के रंगमंच पर थिएटर कैसे दौड़ेगा?

Gulabi Jagat
27 March 2022 8:47 AM GMT
World Theater Day: जिंदगी के रंगमंच पर थिएटर कैसे दौड़ेगा?
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पिछले दो साल थिएटर और थिएटर प्रेमियों के लिए चुनौतियों भरे रहे हैं
पिछले दो साल थिएटर और थिएटर प्रेमियों के लिए चुनौतियों भरे रहे हैं. थिएटर के सामने पहले ही अपने वजूद को बचाए रखने के सवाल थे, कोविड19 की परिस्थितियों ने इस आग में और घी डालने का काम किया है. जब जिंदगी ही रंगमंच की तरह हो जाए और हर शख्स का ही रंगमंच का किरदार सा लगने लगे तो फिर थिएटर की चिंता होगी भी किसे? छोटी—छोटी चीजें ही इस दुनिया को खूबसूरत बनाती हैं, रंगमंच भी उनमें से एक है. आज विश्व थिएटर दिवस है. इस दिन यह कामना करना चाहिए कि रंगमंच पर पहले जैसा शोरगुल होने लगे.
भारत के गांव—गांव में कलाकार हैं, लोककलाएं और लोकमंचों के माध्यम से भारत की एक विविधतापूर्ण तस्वीर नजर आती है. अकेले मध्यप्रदेश में ही बीस तरह के लोकनाट्यों का जिक्र राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपनी किताब 'मध्यप्रदेश का रंगमंच' में किया है, जिनसे लोक सांस्कृतिक संपन्नता दिखाई देती है, (लेकिन इनमें से बहुत सी अब ऐसी हैं जिनका नाम भी नयी पीढ़ी को पता नहीं!) उस जमाने में जबकि मनोरंजन के आधुनिक साधन नहीं थे तब यही कलाएं समाज को जीवंत बनाया करती थीं, बल्कि ये कहें कि उनमें मनुष्य की सामूहिकता आज से कहीं ज्यादा हुआ करती थीं, एक आधुनिक तकनीक सुविधासंपन्न समाज की जो खामियां हो सकती हैं, वह हमने जाने—अनजाने ओढ़ ली है और इसीलिए मनुष्य से मनुष्य की दूरी बढ़ रही है.
लोकमंच, लोककलाएं और लोककलाकार तो इस दौर में बुरी तरह प्रभावित हुए, बल्कि अस्तित्व के संकट तक प्रभावित हैं और तेजी से भागते दौर में उन्हें साधे रखने की चिंता समाज को नहीं है. वह तो सिनेमाघरों को ही थिएटर समझने लगा है.
वैसे कलाएं बहुधा राजाश्रय के सहारे आगे बढ़ती रही हैं, उन्हें समाज का या व्यवस्था का एक सहयोग चाहिए ही होता है और चूंकि वह आक्सीजन की तरह समाज के लिए अनिवार्य नहीं हैं इसलिए इन दोनों ही परिस्थितियों के अभाव में वह खुद ही वेंटीलेटर पर हैं. कलाकार अपने समर्पण और यथासंभव कोशिशों से इसका वजूद बचाए रखने में लगे हैं ताकि अगली पीढ़ियों को बता पाएं कि भारत का रंगमंच कभी इतना संपन्न हुआ करता था.
लेकिन उन्हें इतनी कम सहायता और सुविधाएं मिल पाती हैं जिनके बूते भारत में अच्छे थिएटर की कल्पना साकार होना बहुत मुश्किल है.
केन्द्र सरकार थिएटर के प्रोत्साहन के लिए विविध योजनाएं चलाती है, लेकिन भारत जैसे 130 करोड़ की विशाल आबादी वाले देश में यह बहुत थोड़ा है. एक जानकारी के मुताबिक 2016-17 से लेकर 2019-20 के सालों में रेपर्टरी अनुदान के तहत क्रमश: 564, 564, 545 और 350 कलाकार या संगठनों को मदद की गई. यह मदद की कुल राशि 136 करोड़ रुपए है यानी औसतन 34 करोड़ रुपए सालाना.
कलाकारों की पेंशन एवं चिकित्सा सहायता स्कीम को देखें तो इसमें इन्हीं सालों में 3376, 3376, 4120 और 3070 कलाकारों को मदद की गई है. इस योजना के तहत चार हजार रुपए प्रतिमाह की राशि दी जाती है. यह वयोवृद्ध या अभावग्रस्त जीवन जी रहे कलाकारों के लिए है. इसके लिए औसतन 16 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की राशि दी गई है.
कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए कनिष्ठ और वरिष्ठ कलाकारों को अध्ययनवृत्ति भी दी जाती है, लेकिन यह संख्या भी 16-17 में कनिष्ठ के लिए 178 और वरिष्ठ के लिए 133, 2017-18 में कनिष्ठ के लिए 192 और वरिष्ठ के लिए 176 और इसके अगले साल कनिष्ठ के लिए 200 और वरिष्ठ के लिए 197 थी. युवा कलाकारों को स्कालरशिप भी इसी समयवाधि में क्रमश: 312, 315 और 384 है.
हालांकि संस्कृति विभाग ने अब अपनी वेबसाइट डेशबोर्ड पर योजनाओं की लाभ प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या सार्वजनिक की है. इसके ताजा आंकड़ों में कलाकारों की पेंशन और चिकित्सा सहायता का लाभ बढ़कर 7834 और स्कॉलरशिप योजना का लाभ बढ़कर 2204 लाभार्थियों तक पहुंच गया है. संख्या का बढ़ना एक सुखद संकेत है, लेकिन फिर भी यह पर्याप्त नहीं लगता है. तीन हजार करोड़ के सालाना बजट वाले संस्कृति विभाग के बजट में कला और कलाकारों का हिस्सा बढ़ाया जाना चाहिए.
लोकसभा में दी गई एक जानकारी के मुताबिक संस्कृति मंत्रालय कलाकारों का कोई डेटा नहीं रखता और न ही ऐसा कोई डेटा बेस बनाए जाने की योजना है, लेकिन हम अपने आसपास को देखकर जान सकते हैं कि हमारे समाज में रंगमंच कितने विविध रूपों में मौजूद रहा है और यदि इसे संरक्षित करने के लिए ठीक से प्राथमिकता दी जाए तो भारत का थिएटर बचा रहा सकता है. पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने की चाह रखने वो मुल्क में क्या यह संभव है कि थिएटर और लोककलाओं को बजट में ज्यादा हिस्सेदारी मिले? जरूरत इस बात की भी है कि थिएटर को केवल पेशेवर और बड़े एयरकूल्ड भवनों में होने वाली गतिविधियों तक न देखा जाए, भारत के लोक में बसी विविध कलाओं से भी इसको जोड़कर देखे जाने की जरूरत है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
राकेश कुमार मालवीय वरिष्ठ पत्रकार
20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.
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