सम्पादकीय

विश्व वानिकी दिवस: हरियाली खोती धरती

Neha Dani
21 March 2022 2:50 AM GMT
विश्व वानिकी दिवस: हरियाली खोती धरती
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हमारी संस्कृति, हमारा दर्शन, हमारी सारी नीतियां, कार्यक्रम और रणनीतियां अरण्य की हरियाली से हरी रहें।

हिमालय के पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव मैदानी क्षेत्रों से अधिक स्पष्ट हैं। जितना ऊंचा और बर्फीला पहाड़, उतना ही अधिक जलवायु परिवर्तन से ग्रसित! ऊपर से पहाड़ अत्यंत भंगुर पारिस्थितिक तंत्रों के घर हैं।

प्राकृतिक वन ही पहाड़ों को पारिस्थितिक स्थिरता देता है। जितने अधिक क्षेत्र में वन और जितने घने वन, उतने ही स्थिर पहाड़! पर भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश के पर्वतीय राज्यों में वनों में कमी आई है। जम्मू और कश्मीर में 2019 में 4,270 वर्ग किलोमीटर (किमी) में बहुत घने वन थे, जो 2021 में घटकर 4,155 वर्ग किलोमीटर रह गए। हिमाचल प्रदेश के कुल वन क्षेत्र में नौ वर्ग किमी की वृद्धि बताई गई है। लेकिन छितरे और मध्यम घनत्व श्रेणी के वनों में (40 से 60 प्रतिशत तक कवर) कमी आई है। रिपोर्ट में हिमालय और उत्तर पूर्व में वनाच्छादित क्षेत्र में ह्रास का कारण विकास गतिविधियां और कृषि क्षेत्र में वृद्धि दर्शाया गया है।
भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों, जैसे लद्दाख, जम्मू और कश्मीर, तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में तापमान में अधिकतम वृद्धि रिकॉर्ड की जाएगी और संभवतः वर्षा में कमी का अनुभव होगा, लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा अधिक होने लगेगी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल वन क्षेत्र में 1,540 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है तथा वृक्षों के आवरण में 721 वर्ग किमी की। देश में कुल वन क्षेत्र 7,13,789 वर्ग किमी है, जो देश के भूक्षेत्र का 21.27 प्रतिशत है। वर्ष 2019 की रिपोर्ट में यह आंकड़ा 7,12,249 वर्ग किमी था।
तीन दक्षिण राज्यों, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक और दो पूर्वी राज्यों, ओडिशा और झारखंड में वन क्षेत्र में सर्वाधिक वृद्धि हुई है। उत्तर पूर्व के राज्यों में वनों की सर्वाधिक हानि हुई है।
वनों की अंधाधुंध कटाई हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। वर्ष 1990 के बाद से पृथ्वी ने 13 लाख वर्ग किमी, यानी दक्षिण अफ्रीका से भी बड़े क्षेत्र के बराबर वनों को उजाड़ दिया है। हालांकि कई देश अपनी वन संपदा की रक्षा कर रहे हैं। सोवोर्ल्ड पत्रिका के अनुसार, दक्षिण अमेरिका का सूरीनाम पहला ऐसा देश है, जिसकी 98.3 प्रतिशत भूमि वनों से आच्छादित है। माइक्रोनेशिया का संघीय राज्य, गाबोन, सेशेल्स, और पलाउ क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। ये देश शेष विश्व के लिए अनुकरणीय हैं। लेकिन कुछ देशों ने तो लगता है हरियाली से संबंध विच्छेद ही कर लिया है।
ब्राजील में अमेजन के वनों को 'पृथ्वी के फेफड़े' की संज्ञा दी गई है। पृथ्वी पर प्रत्येक मानव हर पांच सांसों में एक सांस अमेजन के वनों की ऑक्सीजन से लेता है। लेकिन इन वनों की अंधाधुंध कटाई शनैः-शनैः जीवन की सांस छीन रही है। अमेजन वनों के अंधाधुंध उजाड़ के पीछे राजनीतिक और आर्थिक कारण हैं। अमेजन उन समुदायों का घर है, जो अपने जीविकोपार्जन के लिए वर्षा वनों पर निर्भर करते हैं और वनों की रक्षा के लिए लड़ते हैं। अमेजन में हो रही वनों की खुली लूट को ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने और हवा दे दी है।
गत वर्ष ग्लास्गो में हुए जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मलेन (कोप 26) में 100 से अधिक देशों ने 2030 तक वनों की कटाई रोकने का आश्वासन दिया था और राष्ट्रपति बोल्सोनारो भी उनमें से एक थे। फिर भी अमेजन की हरियाली का दोहन अबाध रूप से जारी है, जिससे विश्व भर के पर्यावरण प्रेमियों का मन खट्टा हो रहा है।
जब तक धरती पर वन हैं, तब तक जीवन है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक खुशहाली और भविष्य की आशाओं के कल्ले वनों में ही फूटते हैं। वनों में ही हैं धरती पर जीवन की निरंतरता की जड़ें, और वनों से ही जुड़ी हैं सभी जीवट-भरे भविष्यों की कड़ियां। इसलिए जरूरी है कि हमारी सोच, हमारी संस्कृति, हमारा दर्शन, हमारी सारी नीतियां, कार्यक्रम और रणनीतियां अरण्य की हरियाली से हरी रहें।

सोर्स: अमर उजाला

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