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सम्पादकीय

स्वास्थ्य ढांचे में पर्याप्त सुधार के बिना संक्रमण की तीसरी लहर से मुश्किल होगा मुकाबला

Gulabi
11 Jun 2021 7:56 AM GMT
स्वास्थ्य ढांचे में पर्याप्त सुधार के बिना संक्रमण की तीसरी लहर से मुश्किल होगा मुकाबला
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कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने साफ कर दिया है कि मध्य प्रदेश के कमजोर स्वास्थ्य ढांचे में बदलाव बहुत जरूरी है

संजय मिश्र। हालांकि सरकार ने पूरा जोर लगाकर मुकाबला किया, अस्पतालों की संख्या बढ़ाई गई, बिस्तर, दवाओं और आक्सीजन की अतिरिक्त व्यवस्था की गई, लेकिन संकट इससे भी बड़ा होता गया। इसलिए सरकार अब आगे कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती। वह तीसरी लहर से निपटने की तैयारियों में अभी से जुट गई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विशेषज्ञों के अनुमान के आधार पर जनता को सतर्क किया है कि राज्य में तीसरी लहर सितंबर-अक्टूबर में आ सकती है। सरकार अभी से निपटने की तैयारियों में जुट गई है, लेकिन लोग भी सतर्क रहें। तीसरी लहर कैसी होगी और इसकी तैयारी किस तरह की जाएगी, इस संबंध में सरकार विशेषज्ञों की राय के आधार पर कदम उठा रही है. वैसे कोरोना की दूसरी लहर अब समापन की ओर है। संक्रमण दर एक फीसद से नीचे आ चुका है। सरकार ने एक जून से प्रदेश के ज्यादातर जिलों को अनलाक कर दिया है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर सहित सभी शहरों में दुकानें खुलने लगी हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि सरकार की चेतावनी के बावजूद भीड़ उमड़ रही है। शारीरिक दूरी और मास्क को लेकर बेपरवाही दिख रही है। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की देहभाषा स्पष्ट कर रही है कि स्थिति नियंत्रित करने के बाद अब सरकार को चैन से नहीं बैठना है। सवाल यह है कि इतनी परेशानियों के बाद मध्य प्रदेश कोरोना की दूसरी लहर से उबर तो गया है, लेकिन उसने इससे सीखा क्या? स्वास्थ्य ढांचे की जो कठिनाइयां उभरकर सामने आई थीं उनके समाधान के लिए क्या किया गया?

सबसे पहले बात आक्सीजन की उपलब्धता की करते हैं। मध्य प्रदेश मेडिकल आक्सीजन के लिए पूरी तरह दूसरे प्रदेशों पर निर्भर था। जब चारों ओर से मांग बढ़ी और दूसरे राज्यों ने आक्सीजन देने से हाथ खड़े किए तो यह प्रदेश सरकार के लिए बड़ा धक्का था। मुख्यमंत्री ने अपने प्रभाव का उपयोग कर किसी तरह स्थिति संभाल ली, लेकिन इसके साथ यह भी तय किया कि आगे से दूसरे राज्यों पर निर्भरता खत्म की जाएगी। केंद्र सरकार की मदद और अपने संसाधनों से सभी जिलों में आक्सीजन प्लांट लगाने के लिए राज्य सरकार ने कदम उठाया। जरूरत के हिसाब से कई जिलों में दो आक्सीजन प्लांट लगाए जा रहे हैं। इनमें से आठ जिलों में प्लांट शुरू भी हो गए हैं। राज्य में एक और बड़ी कमी थी जिला अस्पतालों में आइसीयू वार्ड की। बड़े शहरों को छोड़कर ज्यादातर जिला अस्पतालों में आइसीयू वार्ड नहीं थे। अब सभी जिला अस्पतालों में 15 से 20 बिस्तर वाले आइसीयू वार्ड तैयार हो गए हैं। मेडिकल कॉलेजों में भी व्यवस्थाएं बढ़ाई गई हैं। तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए ये तैयारियां भी काफी नहीं हैं।
माना जा रहा है कि तीसरी लहर आने पर सबसे अधिक खतरा बच्चों के लिए होगा, क्योंकि उनके लिए अभी तक टीकाकरण की शुरुआत नहीं हो पाई है। भोपाल-इंदौर जैसे शहरों में जिला अस्पतालों में बच्चों के लिए आइसीयू हैं, लेकिन अन्य जिलों में नहीं है। बच्चों के डॉक्टरों की संख्या भी जरूरत से कम है। इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाटिक्स के मुताबिक मध्य प्रदेश में पीडियाटिक्स के कुल 1208 चिकित्सक हैं। इनमें से भी 51 फीसद डॉक्टर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में हैं।
आशंका जताई जा रही है कि यदि तीसरी लहर में बच्चे कोरोना की चपेट में आए तो स्थिति भयावह हो सकती है। इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाटिक्स के मुताबिक 2010 से 2018 तक देश में मध्य प्रदेश का बर्थ शेयर 7.5 फीसद रहा, जबकि पीडियाटिशियन का शेयर 3.9 फीसद ही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उपकरण तो जुटाए जा सकते हैं, लेकिन डॉक्टर और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण कार्य है। तीसरी लहर के खतरे को कम करने के लिए टीकाकरण को तेज करना ही सबसे बड़ा उपाय है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 60 फीसद जनसंख्या को टीके लगा देने के बाद महामारी नियंत्रित रहेगी। इस हिसाब से प्रदेश में टीकाकरण की रफ्तार बहुत धीमी है। आठ करोड़ की जनसंख्या वाले मध्य प्रदेश में एक करोड़ से कुछ अधिक लोगों को ही अब तक वैक्सीन का पहला या दोनों डोज लगाए गए हैं।
[स्थानीय संपादक, नवदुनिया, भोपाल]


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