सम्पादकीय

क्या कांग्रेस पार्टी में पूरी हो सकेगी प्रशांत किशोर की राजनीतिक महात्वाकांक्षा

Tara Tandi
14 July 2021 2:11 PM GMT
क्या कांग्रेस पार्टी में पूरी हो सकेगी प्रशांत किशोर की राजनीतिक महात्वाकांक्षा
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एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपने आप को साबित कर चुके

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | संयम श्रीवास्तव| एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपने आप को साबित कर चुके प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं कभी छिपी नहीं रही हैं. अपने शुरुआती दौर में ही उनकी इच्छाएं जगजाहिर हो चुकीं थीं. हर पार्टी से उनके राज्य सभा में भेजे जाने की चर्चा उड़ती है पर कुछ दिन में शांत हो जाती है. पिछले साल मार्च में जब उन्होंने जेडीयू (JDU) छोड़कर टीएमसी (TMC) जॉइन किया उस समय ही कहा गया कि वे टीएमसी की ओर से राज्यसभा में भेजे जा सकते हैं. पर उस समय तो नहीं ही भेजे गये बाद में टीएमसी को बीजेपी (BJP) पर इतनी बड़ी विजय दिलाने के बाद भी नहीं भेजे गए. अभी भी नहीं दिख रहा था कि टीएमसी उन पर मेहरबान होने वाली है. अब कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस (Congress) में शामिल हो सकते हैं. देखना यह है कि कांग्रेस में उनकी उम्मीदें कितनी जवां होती हैं.

हम आम जनजीवन में देखते हैं कि एक अच्छा कोच कभी बढ़िया खिलाड़ी नहीं बन पाता, एक अच्छा फिल्म समीक्षक कभी बढ़िया फिल्म नहीं बना सका, चाणक्य खुद चंद्रगुप्त मौर्य की जगह नहीं ले सके. हर राजनीतिक दल में एक चाणक्य रहे हैं पर वो कभी राजनीति के शीर्ष पर नहीं पहुंच सके. अब देखना है कि प्रशांत किशोर अपनी नई पारी , नई भूमिका के साथ कांग्रेस में किस ऊंचाइयों को हासिल कर पाते हैं.

हालांकि अभी तक राजनीतिक दलों मे गुजारे उनके समय का मूल्यांकन किया जाए तो मीठा कम खट्टा ज्यादा है. जिस भी दल के साथ रहे उन्होंने दोस्त कम दुश्मन ज्यादे बना लिए . यही कारण रहा कि पार्टियों के शीर्ष पर रहे लोग भी उन्हें ज्यादे देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाते. वैसे ये समस्या हर टैलेंटेड इंसान के साथ आती है. ऐसे लोग जब काम करने लगते हैं तो उनके काम के तरीके को लेकर आलोचना शुरू हो जाती है. इसमें कोई नई बात नहीं है, पर प्रशांत किशोर का मामला थोड़ा अलग है और लोकतंत्र में राजनीति का चरित्र भी बिल्कुल अलग हो जाता है. कहा जाता है कि पॉलिटिक्स इज द लास्ट रिफ्युजल ऑफ स्कॉउंड्रल. राजनीति ऐसे शातिर और घुटे लोगों का दलदल है कि वहां प्रशांत किशोर जैसे लोग फंसकर रह जाते हैं.

वन मैन पॉलिसी में विश्वास करते हैं प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर की आदत है कि वह जिस भी राजनीतिक दल के साथ काम करते हैं वहां कोई ना कोई एक केंद्र ढूंढ ही लेते हैं जिसके साथ उनकी अच्छी बनती है. पश्चिम बंगाल में उनके साथी अभिषेक बनर्जी थे, वहीं बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. लेकिन इन केंद्र बिंदुओं की वजह से वहां के अन्य नेताओं की आफत हो जाती है क्योंकि फिर फैसले सिर्फ प्रशांत किशोर और उनका केंद्र बिंदु ही करता है. इस वजह से वहां के नेताओ को लगता है कि पार्टी में उनका कोई वजूद ही नहीं है. बंगाल में यही वजह थी की शुभेंदु अधिकारी समेत दर्जनों नेताओं ने टीएमसी छोड़ दी. अभी कुछ दिन पहले पंजाब में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि प्रशांत किशोर की अमरिंदर सिंह के पोते निर्वाण से कुछ ज्यादा ही बन रही थी, जिसके चलते पंजाब कांग्रेस के कई नेता नाराज हो गए थे.

प्रशांत किशोर नए स्टाइल से करते हैं काम

प्रशांत किशोर के काम करने का तरीका औरों से थोड़ा अलग और नया है जिसकी वजह से ज्यादातर स्थानीय और उन नेताओं को परेशानी होती है जो डायरेक्ट उनके टच में नहीं रहते हैं. लेकिन प्रशांत किशोर ने अपने तरीके से भारत की पॉलिटिक्स को बदल कर यह साबित भी किया है कि आज की राजनीति उनके हिसाब वाले रणनीति से ही चलती है. प्रशांत किशोर पर आरोप है कि वह जिस पार्टी के साथ काम करते हैं उसके नेताओं की सीआईडी रिपोर्ट निकलवाते हैं. कहा जा रहा है कि जिसकी सीआईडी रिपोर्ट खराब है उसका टिकट कट जाएगा. प्रशांत किशोर ने 2014 के लोकसभा चुनाव, जिसमें वह पीएम मोदी के रणनीतिकार थे. उस चुनाव में पीके ने आईटी सेल को जन्म दिया. जिसने नरेंद्र मोदी को ब्रांड मोदी बना दिया और बीजेपी भारी बहुमत से जीती. आज उसी का प्रयोग हर राजनीतिक पार्टी कर रही है. प्रशांत किशोर डेटा पर काम करने वाले व्यक्ति हैं वह यह देखते हैं कि किसका डेटा क्या कह रहा है और वह उसी हिसाब से काम करते हैं. प्रशांत किशोर के साथ पुराने नेताओं के लिए यही बड़ी समस्या बन जाती है.

जिस पार्टी के साथ काम करते हैं वहां दूसरे दर्जे के नेता परेशान रहते हैं

प्रशांत किशोर इससे पहले बंगाल में ममता बनर्जी के साथ काम कर रहे थे. लेकिन पश्चिम बंगाल में जैसे ही प्रशांत किशोर की एंट्री हुई उससे टीएमसी के कई बड़े नेता नाराज हो गए और यहां तक कहने लगे कि अब प्रशांत किशोर हमें राजनीति सिखाएंगे. लेकिन पीके को ममता बनर्जी की खुली छूट थी और उनके साथ ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी थे जिस वजह से उन्होंने बंगाल में खुल कर अपने हिसाब से फैसले लिए. टीएमसी के लिए उसका खमियाजा यह हुआ कि उसके बड़े-बड़े नेताओं ने पार्टी से बगावत कर ली और बीजेपी में शामिल हो गए. शुभेंदु अधिकारी उसमें मुख्य नाम थे, जो व्यक्ति कभी टीएमसी में ममता के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेता था और जिसे ममता का साया कहा जाता था आज वही नंदीग्राम से ममता के खालिफ खड़ा है. बिहार में भी प्रशांत किशोर को यही झेलना पड़ा था. जब वह बिहार में नीतीश कुमार के साथ काम करने गए तो नीतीश ने उन्हें राज्य में मंत्री का दर्जा दिया इसके साथ JDU का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया. लेकिन इस बात से जनता दल यूनाइटेड के कुछ बड़े नेता नाराज थे, उन्हें लगा कि कल के आए व्यक्ति को जो सम्मान मिल रहा है वह उन्हें कभी नहीं मिला. जिसकी वजह से अंदर ही अंदर जेडीयू में नाराजगी बढ़ती चली गई. प्रशांत किशोर का इतिहास रहा है कि वह जिस भी पार्टी में गए हैं वहां के मुखिया और दो चार लोगों के अलावा उनसे पूरी पार्टी नाराज रहती है.

पंजाब में अमरिंदर सिंह को भी विरोध झेलना पड़ा था

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को पब्लिकली यह बोलना पड़ा कि पंजाब कांग्रेस में टिकट बंटवारे में पीके की कोई भूमिका नहीं होगी. दरअसल 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कैप्टन अमरिंदर ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत कुमार को हायर किया हुआ है. पार्टी के एक धड़े को शुरू में ही यह बात नागवार लगी थी कि बिना आपस में विचार-विमर्श किए अमरिंदर सिंह ने किस तरह प्रशांत किशोर से कॉन्ट्रेक्ट कर लिया. पार्टी में बढ़ते असंतोष के बीच अमरिंदर सिंह ने क्लीयर किया है कि टिकट बंटवारे को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है, यह काम पार्टी पहले की तरह संगठन से विचार विमर्श के आधार पर ही करेगी.

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