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सम्पादकीय

इतनी बड़ी हार के बाद कांग्रेस में क्यों नहीं उठ रही असन्तोष की आवाज

Gulabi
4 May 2021 2:09 PM GMT
इतनी बड़ी हार के बाद कांग्रेस में क्यों नहीं उठ रही असन्तोष की आवाज
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कांग्रेस की खबर

सुष्मित सिन्हा। कार्तिकेय शर्मा। कांग्रेस इस वक़्त देश की राजनीति में ना तीन में है ना पांच में है. अगर कड़े शब्द का इस्तेमाल करूं तो कांग्रेस का वही हाल है जैसे कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना. जहां बीजेपी हार रही है वहां पार्टी ताली बजाने पहुंच जाती है लेकिन उसे अपने विस्तार और भविष्य के बारे में कतई चिंता नहीं हैं. गठबंधन भी ऐसे किये जा रहें हैं जिस से पार्टी का स्वयं का आधार खत्म होता चला जा रहा है. बंगाल की हार पर अधीर रंजन चौधरी खुद कह रहे हैं कि हिन्दू वोट बीजेपी में चला गया और मुस्लिम वोट तृणमूल के पास. यानी कांग्रेस को किसी वैचारिक आधारशिला के अनुसार वोट ही नहीं मिला. यही हाल केरला में हुआ जहां लेफ्ट ने अपनी आधारशिला को और बड़ा कर लिया.


ऐसे में सवाल ये उठता है कि इतनी बड़ी हार के बाद भी कांग्रेस पार्टी में एक भी व्यक्ति ने चू चपड़ क्यों नहीं की. किसी ने ये सवाल नहीं पूछा कि अजमल के साथ असम में गठबंधन राहुल गांधी से पूछ कर किया गया था या सोनिया गांधी से? किसी ने ये सवाल नहीं उठाया कि घनघोर गैर मोदीवाद से कांग्रेस को क्या फायदा हुआ है? क्या केवल मोदी के विरोध करने से कांग्रेस वापिस अपने लुटे हुए जनाधार को जुटा सकती है. कब तक ये सोच हावी रहेगी की लोग मोदी से नाराज़ होंगे और कांग्रेस के पास वापिस आ जायेंगे? कब तक कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी सभी ज़रूरी फैसले लेंगे पर उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी? यही कारण है की कांग्रेस पार्टी को एक के बाद एक राज्य में मात खानी पड़ रही है.

कांग्रेस को इतिहास पढ़ने की जरूरत है
इतिहास भी पढ़ लेते तो शायद कुछ फायदा होता. आज कांग्रेस हाशिये पर है लेकिन एक ज़माना था जब कांग्रेस जन संघ के बारे में कहती थी कि,'शासन करना कोई खेल नहीं, जन संघ के दियों में तेल नहीं.' आज बीजेपी ये उल्टा कांग्रेस पर इस्तेमाल करती है. बीजेपी और स्थानीय पार्टियां लोगों तक ये सन्देश पहुंचाने में कामयाब हो गयी हैं की कांग्रेस का अब राज काज से कोई लेना देना नहीं है और इसके लिए आपके पास बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं.

सोनिया गांधी का सारा ध्यान राहुल को कांग्रेस की कमान देने पर है
लेकिन इसके बीच जो सबसे ज़्यादा तकलीफ देने वाली बात है वो है सोनिया गांधी की खामोशी. वो कांग्रेस की अध्यक्ष हैं लेकिन उन्होंने पिछले 2 साल में कोई ऐसा फैसला नहीं लिया जिससे पार्टी के नेतृत्व की तकलीफ खत्म हो? सोनिया गांधी ने अपने जीवन में कई फैसले अंतरात्मा की आवाज़ के आधार पर लिए, चाहे वो फैसला प्रधानममंत्री के पद को दो बार ठुकराने का था या कांग्रेस पार्टी को टूटने से बचाने का. लेकिन अब जब कांग्रेस पार्टी को सबसे से ज़्यादा नेतृत्व की ज़रुरत है तो सोनिया गांधी लोगों को जोड़ने की भूमिका नहीं निभा रही हैं. लोग तो छोड़ दीजिये, पार्टी के नेताओं को पता नहीं है की सोनिया गांधी के दिमाग में क्या चल रहा है. बैठकें फौरी तौर पर हो रही हैं और सारी कोशिश यही है कि एक बार कांग्रेस की कमान राहुल गांधी संभाल लें. सोनिया गांधी की मातृ प्रेम के लिए निंदा करना गलत होगा. हर भारतीय मां की तरह उनका फोकस केवल अपने बेटे पर ही है. लेकिन इस फोकस के चक्कर में कांग्रेस पार्टी की लुटिया डूब गयी है.

जिस तरह से राहुल गांधी ने कांग्रेस की नीतियों को प्रभावित किया है उसका पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला. राष्ट्रीय स्तर पर मोदी ने चाहे कितनी गलतियां की हों और कितनी बार राहुल गांधी सही साबित हुए हों, उसका राजनितिक फायदा कांग्रेस को नहीं मिला है. इसका सबसे बड़ा उदहारण, बिहार चुनाव था. 2020 के मजदूर पलायन में बिहार से लाखों मजदूर थे, लेकिन राहुल गांधी के लाख बोलने के बाद भी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बन कर बीजेपी ही उभरी.

बीजेपी के पास वैचारिक क्षमता है
चाहे बीजेपी का कितना मज़ाक बना लें, वो आज पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षीय पार्टी है. असम में उसने अपनी साख बचा ली और दुबारा सत्ता में हैं. कांग्रेस शायद अकेली राष्ट्रीय पार्टी है जो पिछले 2 साल में अपना नेतृत्व तय नहीं कर पा रही है. ये केवल संगठन की नहीं बल्कि वैचारिक विफलता है. आरएसएस ने भी कितनी बार अडवाणी और वाजपेयी के बीच फेर बदल किये और बाद में मोदी के लिए आडवाणी को रिटायर कर दिया था. यहां पार्टी अपने भविष्य का फैसला ही नहीं कर पा रही है. 2 साल हो गये हैं और राहुल गांधी अभी भी पीछे से कांग्रेस पार्टी चला रहें हैं. जो लोग इस मामले पर सवाल उठाते हैं उनको हाशिये पर बिठा दिया जाता है.

कांग्रेस को अपने एजेंडा पर काम करने की जरूरत
कांग्रेस शायद ये समझ नहीं रही है कि जीवन में हर पेशेंट का एक ऐसा वक़्त आता है जब डॉक्टर भी सर्जरी करने से इंकार कर देता है. कांग्रेस का भी यही हाल हो सकता है. इसके 2 बड़े राजनीतिक उदहारण हैं. स्वतंत्र पार्टी और जन संघ. दोनों पार्टियों की दुकान इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में बंद कर दी थी. दोनों पार्टियां नाम की राष्ट्रीय पार्टी बन कर रह गई थीं. वैसे भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु, तेलंगाना, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में नदारद है. महाराष्ट्र में कमज़ोर है. सभी सीटों को जोड़ दूं तो ये 298 होंगी. ऐसे में आपको लगता है की बिना संगठन पर काम किये और केवल चुनावी गठबंधन से कांग्रेस क्या सत्ता में काबिज़ हो सकती है? नहीं, कांग्रेस को लोगों को अपना एजेंडा देना होगा. घनघोर गैर मोदीवाद की सीमा होती है, जैसे कभी इंदिरा हटाओ की सीमा होती थी. लोग कोरोना से परेशान हैं और मोदी से नाराज़ लेकिन उनको सात साल बाद आज भी राष्ट्रीय विकल्प की तलाश है.
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