सम्पादकीय

हिजाब की जरूरत क्यों

Subhi
9 Feb 2022 3:08 AM GMT
हिजाब की जरूरत क्यों
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यह कैसा दुर्भाग्य है कि 21वीं सदी के भारत में कर्नाटक की मुस्लिम छात्राएं विद्यालयों में हिजाब पहनने की मांग के लिए आन्दोलन कर रही हैं जबकि देश में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बहुत कम आंकी जाती है।

आदित्य नारायण चोपड़ा: यह कैसा दुर्भाग्य है कि 21वीं सदी के भारत में कर्नाटक की मुस्लिम छात्राएं विद्यालयों में हिजाब पहनने की मांग के लिए आन्दोलन कर रही हैं जबकि देश में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बहुत कम आंकी जाती है। होना तो यह चाहिए था कि मुस्लिम समाज की तरफ से लड़कियों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक आन्दोलन चाहिए था मगर उल्टा यह हो रहा है कि विद्यालयों में जो भी कन्याएं पढ़ती हैं उन्हें धार्मिक रूप से कट्टर बनाये जाने की मुहीम कुछ स्वार्थी तंजीमें चला रही हैं। स्नातक स्तर से नीचे के स्कूल व इंटरमीडिएट कालेजों की अपनी पोशाक होती है जिसे सभी विद्यार्थियों को मानना पड़ता है और विद्यालय के नियमों से बन्धना पड़ता है परन्तु भारत में 1947 में इसके हिन्दू-मुसलमान के आधार पर विभाजन हो जाने के बावजूद पाकिस्तानी मानसिकता के ऐसे तत्व अभी भी मौजूद हैं जो भारत के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित हो जाने के बावजूद मुस्लिम नागरिकों को दकियानूसी और मजहब की चारदीवारी से बाहर नहीं निकलना देना चाहते जिसकी वजह से वे हर सामाजिक क्षेत्र में मुसलमानों की अलग पहचान बनाये रखना चाहते हैं। हिजाब का स्कूली पोशाक या ड्रेस कोड से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है परन्तु मुस्लिम कट्टरपंथी तंजीमे इसे इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक कुरान शरीफ से जोड़ कर मुस्लिम छात्राओं को विद्याध्यन के दौरान भी अपनी अलग पहचान दिखाने के लिए मजबूर करती हैं। मुख्य सवाल यह है कि मुस्लिम छात्राओं को ही अपनी धार्मिक पहचान दिखाने के लिए हिजाब की आवश्यकता क्यों पड़े जबकि स्कूल में हर विद्यार्थी एक समान रूप से शिक्षा ग्रहण करता है और अध्यापक उनके साथ धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते हैं? इसकी एकमात्र वजह क्या यह हो सकती है कि मुस्लिम वर्ग हर कीमत पर अपनी पहचान को पहले अपने धर्म से जोड़ना चाहता है। यह मानसिकता ठीक वही है जो भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन को कमजोर करने के लिए मुस्लिम लीग ने भारतीय मुसलमानों में फैलाई थी। मुस्लिम लीग का नेता मुहम्मद अली जिन्ना कहा करता था कि हिन्दू-मुसलमानों के रहने, खाने-पीने आदि के तौर-तरीके तक अलग-अलग हैं। हिन्दुओं के जो एतिहासिक राष्ट्र 'नायक' हैं वे मुसलमानों के लिए 'खलनायक' हैं और इसके विपरीत मुसलमानों के नायक हिन्दुओं के लिए खलनायक हैं। जिन्ना की मुस्लिम लीग ने भारत के मुसलमानों को अपनी ही 'धरती' भारत से तोड़ने के लिए जो भी तर्क दिये वे भारतीय मुसलमानों की मूल संस्कृति के ही खिलाफ थे क्योंकि भारत के 95 प्रतिशत मुसलमान हिन्दू से ही धर्मान्तरण करके मुस्लिम हुए थे जिसकी वजह से भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाले मुस्लिम समाज के लोग अपनी क्षेत्रीय संस्कृति का ही अनुसरण करते थे परन्तु मुस्लिम लीगी के मानसिकता के लोगों ने स्वतन्त्र धर्मनिरपेक्ष भारत में अभिव्यक्ति व धार्मिक स्वतन्त्रता के नाम पर जिस तरह मुसलमानों को मजहबी दायरे में ही कैद करने की कोशिश की उसका असर मुस्लिम समाज पर चौतरफा पड़ा और आज आजादी के 75वें साल में हम उसका कर्नाटक में बेहूदा प्रभाव देख रहे हैं। भारत में जब कोई विद्यार्थी किसी विद्यालय में प्रवेश पाता है तो वह अपनी धार्मिक पहचान और पुस्तकों को घर पर छोड़ कर ही आता है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है। जब हम धर्म का प्रदर्शन सार्वजनिक तौर पर करना शुरू कर देते हैं तो साम्प्रदायिकता वहीं से शुरू हो जाती है। यह बात हिन्दू समाज पर भी एक समान रूप से लागू होती है। विद्यालय केवल शिक्षा के घर उसी प्रकार होते हैं जिस प्रकार कोई चिकित्सालय स्वास्थ्य प्राप्त करने का स्थान होता है। क्या कोई मुस्लिम महिला या छात्रा किसी अस्पताल में भर्ती होने पर भी हिजाब लगाने की जिद कर सकती है या बुर्का पहनने की हठ कर सकती है। विद्यालय को इससे कोई मतलब नहीं होता कि किसी भी धर्म में पैदा होने वाले छात्र की धार्मिक पुस्तकों में क्या लिखा है अथवा मुल्ला-मौलवी या पंडित उसे किस तरह जिन्दगी गुजारने की ताईद करते हैं। विद्यालय को केवल विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने से मतलब होता है और इसके लिए वे अपने अनुशासन नियम बनाते हैं जिनका पालन हर विद्यार्थी को करना होता है। मगर कर्नाटक की विभिन्न सड़कों पर विद्यालयों के बाहर ही जिस तरह जय श्रीराम व अल्लाह-हू- अकबर के नारे लग रहे हैं, क्या ये हमें भारत में पाकिस्तानी मानसिकता के पुनः सिर उठाने के खतरे नहीं बता रहे। याद रखा जाना चाहिए कि जब पाकिस्तान बनाने की तहरीक जिन्ना चला रहा था तो उसने मुसलमानों को यह नारा दिया था, 'पाकिस्तान का नारा क्या–या इलाही इल्लिलाह'। मगर जिन्ना के नामुराद पाकिस्तान का हश्र हम आज जो देख रहे हैं उसमें सिवाय दहशतगर्दी के खेती के दूसरा काम नहीं होता। जबकि दूसरी तरफ सऊदी अरब जैसे इस्लामी मुल्क सऊदी अरब के स्कूली पाठ्यक्रमों में महाभारत व रामायण जैसे हिन्दू ग्रन्थों को शामिल किया जा रहा है। अतः मजहब के नाम पर मुस्लिम छात्राओं को कई सदियों पीछे धकेलने वाली मुस्लिम तंजीमों को सोचना चाहिए कि वे अपनी महिलाओं को किस जहनियत का शिकार बना देना चाहते हैं। संपादकीय :पिता के रास्ते पर चल रहे राजीव गुलाटी जीस्कूलों में चहल-पहलदल-बदल न करने की 'शपथ'नवजोत सिद्धू :कटी पतंगजम्मू-कश्मीर में 'परिसीमन'...जरा आंख में भर लो पानीबहरहाल सारा मामला अब कर्नाटक उच्च न्यायालय के विचार क्षेत्र में है। मगर आज सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों ने साफ कह दिया है कि भारत संविधान से चलने वाला देश है। जो संविधान कहेगा उसी के अनुसार वह अपना फैसला देगा न कि लोगों की भावनाएं देख कर। देश कभी भी भावनाओं से नहीं चलता बल्कि कानून से चलता है। मुस्लिम छात्राओं की भावना शिक्षा प्राप्त करके अपने समाज को रोशन ख्याल बनाने की होनी चाहिए न कि धार्मिक प्रतीकों की जंजीर में जकड़ कर पिछली सदियों में जीने की। उनकी भी भारत के विकास और प्रगति में वही भूमिका है जो किसी हिन्दू छात्रा की। उन्हें स्वयं ही पुराने जंग लगे रस्मों-रिवाजों को तोड़ कर वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। भारत का संविधान भी यही कहता है कि सरकारें लोगों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देगी। यह 21वीं सदी चुनौतियों की ऐसी सदी है जिसमें टैक्नोलोजी ही मजहबी तास्सुब पैदा करने वालों को करारा जवाब दे सकती है। वरना मुल्ला-मौलवी तो यह भी कहते हैं कि लड़कियों का मोबाइल फोन इस्तेमाल करना गैर इस्लामी है।

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